बंगाल में ‘रिप्ले’ 2002: हिंसा की खुली छूट, अमित शाह की चुप्पी?

उत्कर्ष सिन्हा
चुनावी नतीजों की धूल अभी भी हवा में उड़ रही है, और पश्चिम बंगाल की सड़कें खून से लाल हो चुकी हैं। टीएमसी समर्थकों पर हमले, उनके दफ्तरों में आगजनी, मांस की दुकानों पर लाठियां—यह सब भाजपा कार्यकर्ताओं का ‘जश्न’ बन गया है।
केंद्रीय सुरक्षा बल (सीएफआर) चुपचाप तमाशा देख रहे हैं, मानो उन्हें ऊपर से ‘रिहा’ करने का आदेश हो। नई सरकार की शपथ से ठीक पहले यह हिंसा 2002 के गुजरात दंगों की भयावह याद ताजा कर रही है, जब पुलिस को दो दिनों तक ‘शांत’ रहने का अघोषित फरमान सुनाया गया था। क्या बंगाल में भी यही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है?
हिंसा की लंबी फेहरिस्त: खौफ का पर्याय बने बंगाल के जिले
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा अब चरम पर पहुंच चुकी है, और इसकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मानवता शरमा जाए। भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा टीएमसी के सैकड़ों दफ्तरों पर हमले हुए हैं—उत्तर 24 परगना के बाशिरहाट में 50 से ज्यादा टीएमसी कार्यालयों को आग लगा दी गई, जहां कार्यकर्ताओं को घरों से घसीटकर पीटा गया। दक्षिण 24 परगना के जयनगर में एक टीएमसी पंचायत प्रमुख को जिंदा जलाने की कोशिश की गई, जबकि हावड़ा के उलुबरिया में दर्जनों मोटरसाइकिलों पर सवार होकर हमलावरों ने ममता बनर्जी के विशाल पोस्टरों को रस्सी बांधकर सड़कों पर घुमाया, जैसे कोई अपमानजनक जुलूस निकाल रहे हों।
बांकुरा जिले में मांस की दुकानों पर सुनियोजित हमले हुए कम से कम 30 दुकानें तोड़ी गईं, माल लूटा गया और आग लगा दी गई, जो स्पष्ट रूप से सांप्रदायिक रंग धारण कर चुका है।
मालदा और मुर्शिदाबाद में मुस्लिम बहुल इलाकों को निशाना बनाया गया, जहां भाजपा समर्थकों ने ‘जय श्री राम’ के नारों के साथ लाठियां बरसाईं। बर्धमान-दुर्गापुर में एक टीएमसी कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई, जबकि उसके परिवार को घर से भगाया गया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो दिखाते हैं कि हमलावर खुलेआम हथियार लहरा रहे हैं, और स्थानीय पुलिस या सीएफआर की कोई प्रतिक्रिया नहीं।
कुल मिलाकर, 300 से ज्यादा आगजनी की घटनाएं, 500 से अधिक हमले, और दर्जनों घायल—ये आंकड़े एनडीटीवी, इंडिया टुडे, एबीपी आनंद और स्थानीय पुलिस रिपोर्ट्स से लिए गए हैं। भाजपा नेताओं ने इसे ‘बदला’ करार दिया है, लेकिन यह बदला नहीं, सुनियोजित अराजकता है।
नई सरकार की शपथ से पहले यह हिंसा भाजपा को ‘खुली छूट’ का संकेत दे रही है, जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है। निर्दोष परिवार बेघर हो रहे हैं, महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं, और पूरा राज्य दहशत में जी रहा है।
अमित शाह और गृह मंत्रालय: चुप्पी जो साजिश की गवाही है
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी बंगाल की इस हिंसा पर सबसे बड़ा सवाल है। वे चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल को ‘रक्तरंजित’ बताते फिरे और ‘ममता के राज को खत्म करो’ का नारा बुलंद किया, लेकिन नतीजों के बाद जब उनके ही कार्यकर्ता हिंसा पर उतर आए, तो शाह खामोश हैं? गृह मंत्रालय, जो आंतरिक सुरक्षा का जिम्मेदार है, ने एक भी बयान जारी नहीं किया, न ही अतिरिक्त केंद्रीय बल तैनात करने का ऐलान किया। क्या यह संयोग है कि सीएफआर की टीमें मौके पर मौजूद होने के बावजूद हस्तक्षेप नहीं कर रही? वीडियो प्रमाण साफ दिखाते हैं कि केंद्रीय बल हिंसकों को रोकने के बजाय उन्हें गुजरने दे रहे हैं, जो अघोषित निर्देशों की ओर इशारा करता है।
2002 के गुजरात दंगों की यादें अभी ताजा हैं, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा कि पुलिस को 48 घंटे ‘शांत’ रहने का फरमान दिया गया था। आज शाह, जो उस दौर के प्रमुख संगठक रहे, उसी पैटर्न को बंगाल में दोहराने का आरोप झेल रहे हैं। गृह मंत्रालय के पास सीएफआर, सीआरपीएफ और अन्य बलों का पूरा नियंत्रण है—फिर उनकी निष्क्रियता क्या दर्शाती है? क्या भाजपा को नई सरकार बनाने से पहले ‘साफ-सफाई’ की खुली छूट दी गई है?
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चुनावी हिंसा पर केंद्र को जवाबदेह ठहराया है, लेकिन यहां तो केंद्र खुद आरोपी की कुर्सी पर बैठा नजर आता है। शाह का एक ट्वीट या बयान आग बुझा सकता था, लेकिन उनकी चुप्पी आग को हवा दे रही है। यह न सिर्फ बंगालवासियों के साथ विश्वासघात है, बल्कि पूरे राष्ट्र के संवैधानिक ढांचे पर प्रहार है। क्या गृह मंत्रालय को इस बात का तत्काल जवाब नहीं देना चाहिए कि हिंसा रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, या यह भी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है?
यह हिंसा न सिर्फ बंगाल की शांति को भंग कर रही है, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर रही है।


