Friday - 6 February 2026 - 10:49 AM

RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट 5.25% पर बरकरार, लोन लेने वालों को झटका या राहत?

जुबिली न्यूज डेस्क

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने गुरुवार, 6 फरवरी को मौद्रिक नीति का ऐलान कर दिया। 4 फरवरी से शुरू हुई मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक आज समाप्त हुई, जिसमें लिए गए अहम फैसलों की जानकारी साझा की गई।

आरबीआई गवर्नर ने बताया कि मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों में कोई बदलाव न करने का फैसला किया है। इसके तहत रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है और पॉलिसी स्टांस न्यूट्रल बना रहेगा।

MPC का फैसला क्या रहा?

मौद्रिक नीति के ऐलान के बाद RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा,“मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने पॉलिसी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने और न्यूट्रल रुख बनाए रखने का निर्णय लिया है।”

उन्होंने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है और आने वाले साल में आर्थिक गतिविधियों के बेहतर रहने की उम्मीद है।

GDP और महंगाई को लेकर RBI का आउटलुक

आरबीआई गवर्नर ने बताया कि घरेलू महंगाई और ग्रोथ आउटलुक पॉजिटिव बना हुआ है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अगले दो दिनों में भारत को GDP और महंगाई दोनों के लिए नया बेस ईयर मिलने वाला है। आगे की मौद्रिक नीतियां नई सीरीज के महंगाई आंकड़ों के आधार पर तय की जाएंगी।

रिजर्व बैंक ने

  • FY 2025-26 के लिए ग्रोथ आउटलुक को 7.3% से बढ़ाकर 7.4% कर दिया है।

  • वहीं, FY 2026-27 की पहली तिमाही के लिए महंगाई अनुमान 4% और

  • दूसरी तिमाही के लिए 4.2% रखा गया है।

पिछले साल कितनी कटौती हुई थी रेपो रेट में?

साल 2025 में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की थी।

  • फरवरी: 25 बेसिस पॉइंट

  • अप्रैल: 25 बेसिस पॉइंट

  • जून: 50 बेसिस पॉइंट

  • दिसंबर: 25 बेसिस पॉइंट

दिसंबर की पॉलिसी मीटिंग में रेपो रेट को 5.5% से घटाकर 5.25% किया गया था।

क्या होता है रेपो रेट?

रेपो रेट वह दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कमर्शियल बैंकों को कर्ज देता है। बैंक सरकारी प्रतिभूतियों के बदले RBI से लोन लेते हैं।

  • रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों के लिए उधार महंगा हो जाता है

  • इसका असर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों पर पड़ता है

रेपो रेट का आम जनता पर असर

रेपो रेट कम होने से

  • लोन सस्ते होते हैं

  • EMI घटती है

  • लोगों की परचेजिंग पावर बढ़ती है

  • बाजार में मांग और निवेश बढ़ता है

वहीं कंपनियों के लिए पूंजी की लागत घटने से कैश फ्लो में सुधार होता है, जो आर्थिक गतिविधियों को गति देता है।

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