निकिताशा कौर बरार की कविताएँ 

मेरा प्रेम बरगद के पेड़ जैसा हो सकता था—
विशाल, विस्तृत और प्रश्रयी
या कि गिलहरी की पूँछ जैसा—
चंचल, मोहक और संतुलित
वह हो सकता था वैसा,
जैसा कछुआ अपने अंडों से करता है—
गुप्त, आशंकित और एकाकी।
पर मेरे प्रेम ने चुना
इस सबसे इतर
आर्कटिक का कोई हिमखंड होना

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जो मैं तुम्हें इक राह दूँ 
अपने हाथ की तीन लकीरें
बुदबुदाई सी वो मन्नत
और दो अंतर्मुखी आँखें

जो मैं तुम्हें पतवार दूँ 
एक आधी नदी
रात साढ़े बारह की
ट्रेन का हरा सिग्नल

जो दूँ एक साहिर का गीत
इस्मत की दो कहानियाँ
और पाश की कविताएँ चार
तो क्या आओगे मुझ तक ?

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