विशिष्ट ही नहीं विरल भी थे एम. शकील

उनको भुला देने का मतलब सेवा, संघर्ष एवं त्याग की गौरवपूर्ण परम्परा को विस्मृति में धकेल देना है। चैपटियां के झंवाईटोले मुहल्ले में प्रतिष्ठित हकीम परिवार में 21 जुलाई 1927 को जन्मे एम. शकील यूनानी चिकित्सा, उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के उपमहादीपीय संस्थान तकमीलुततिब कालेज के संस्थापक हकीम अब्दुल अज़ीज़ के पौत्र थे।

नख़ास से चैपटियां – सराय माली ख़ा जाने वाली सड़क पर अकबरी गेट ढाल के निकट बायीं ओर स्थापित नगर निगम का हकीम अब्दुल अज़ीज़ रोड अंकित पत्थर पर बहुत लोगों की दृष्टि अवश्य पड़ी होगी।

डाॅ. राम विलास शर्मा के समकालीन उर्दू आलोचक प्रो0 मुम्ताज़ हुसैन के कथन पर विश्वास करें तो वह कम से कम पन्द्रह बार गिरफ़्तार हुए।

शकील के बारे में लिखते हुए उन्होंने यह भी दर्ज किया है कि वह शहर की कितनी मज़दूर यूनियनों के पदाधिकारी थे, बता पाना मुश्किल है।


आज़ादी की जंग में वह ठीक से युवा होने से पहले ही मात्र चौदह बरस के कमसिन में ही कूद पड़े थे। पच्चीस वर्ष की आयु में 1941 में विप्लवी गतिविधियों के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा।

21 दिन बाद वह रिहा तो हो गये परन्तु जल्दी शहीद भगत सिंह के पूर्व सहयोगी क्रांतिकारी कामरेड शिव वर्मा व अन्य के साथ उन्हें पुनः जेल में डाल दिया गया।

देश को आज़ाद हुए दो वर्ष ही बीते थे कि आज़ादी के लिए बहुत कुछ हार जाने वाले इस सेनानी को 1949 में रेल कर्मचारियों की प्रचण्ड हड़ताल में सक्रिय भूमिका के कारण कथाकार, चिकित्सक रंगकर्मी डा. रशीद जहाँ , कम्युनिस्ट नेता हाजरा बेगम तथा अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

जहाॅ इन लोगों ने राजनैतिक बन्दियों को मिलने वाली सुविधाओं को स्वीकार करने से मना करते हुए दूसरे बन्दियों के साथ जेल प्रशासन द्वारा किये जाने वाले दुव्र्यवहार के ख़िलाफ़ लम्बी भूख हड़ताल कर दी। जिसके फलस्वरूप रशीद जहाँ का कैंसर का रोग बिगड़ और थोड़े अन्तराल उपरान्त जुलाई 1954 में मास्को में इलाज के दौरान उनका दुखद निधन हो गया। वह वहीं दफ़न हुईं।


शकील की वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुमान इससे लग सकता है कि उन्होंने अपना सियासी सफ़र क्रांतिकारी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपीआई) से आरंभ किया।

बाद में वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गये। 1957 के चुनाव में लखनऊ पूर्व से तत्कालीन मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता के ख़िलाफ़ उन्होंने त्रिलोकी सिंह को विजयी बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। अनेक प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं के साथ ही उन्हें जय प्रकाश नारायण व राम मनोहर लोहिया जैसे शिखर समाजवादी नेताओं के साथ अनेक प्रसिद्ध लेखकों जैसे कि सज्जाद ज़हीर, डा. अब्दुल अलीम, मजाज, व सिब्ते हसन का सान्निध्य भी प्राप्त हुआ।

दुर्लभ सान्निध्य ने उनकी जीवटता में नये पंख लगाए। इन तमाम व्यस्तताओं के कारण वह आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं बना पाए। जबकि उनके कंधों पर पारिवारिक ज़िम्मेदारियां भी आ चुकी थीं। वह जीवट तथा दृढ़ संकल्पी व्यक्ति थे। ऐसे कठिन समय में भी वह वंचित वर्गों के पक्ष में निरन्तर संघर्ष तथा जन सुविधाओं के लिए निरंतर संघर्ष स्े विमुख नहीं हुए।

जिस सियासी पार्टी ने उन्हें जेल में डाला था उसी पार्टी के श्रम संघ (मज़दूर संगठन) इंटक के वह कार्यकर्ता बन गये। व्यापक सहमति से उन्हें भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के श्रमिक संगठन का अध्यक्ष मनोनीत किया गया जिससे वह अन्तिम समय तक जुड़े रहे।

विक्रम काटन मिल, रिक्शा तांगा यूनियन, कृषि कामगार यूनियन तथा मेडिकल कालेज वार्ड ब्वाय संघ के भी वह प्रमुख पदाधिकारी रहे।


कम्युनिस्टों, समाजवादियों तथा गांधी वादियों के समान उन्होंने भी आजीवन पैदल चलने को प्राथमिकता दी। कोई भी मौसम हो शकील साहब को मेडिकल कालेज से तालकटोरा जाने वाली सड़क पर किसी भी समय सफ़ेद कुर्ते पायजामे में, सर्दियों में सदरी के साथ पान की पीक से होंठ लाल किये पैदल चलते देखा जा सकता था।

इसी दरवेशाना शान से वह अपने बाबा के नाम वाली सड़क पर भी चला करते थे, जिसके एक मकान की बैठकी में उनके मौसा हसन असकरी साहब से कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की भेंट हुई थी।

यही वह समय भी था जब उनकी पत्नी श्रीमती अख़्तर बेगम कश्मीरी मोहल्ला गल्र्स कालेज के प्रधानाचार्या के पद पर रहते हुए स्कूल का नाम रौशन कर रही थीं।

उनकी तीन बेटियां उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर थीं। हिन्दी की सुपरिचित पत्रकार सीमा जावेद उनकी सबसे छोटी पुत्री हैं।

बड़ी बेटी अमरीका में है जबकि मॅझली पुत्री प्रतिष्ठित चिकित्सक है। जीवन की इसी गहमागहमी तथा नई आती चुनौतियों के बीच उन्होंने 1976 में भारतीय खाद्य निगम में ठेके पर मज़दूर रखने की अन्यायपूर्ण प्रथा के विरुद्ध लम्बे संघर्ष का बिगुल फूँक दिया।

मज़दूर ठेका प्रथा के अभिशाप से मुक्त हुए। निश्चय ही यह जीत शकील साहब के जीवन की बड़ी उपलब्ध्धि थी। दूसरे उद्योगों – संस्थानों के मज़दूर व कर्मचारी अपनी समस्याओं के सम्बन्ध में उनसे सम्पर्क करने लगे।

अन्ततः उन्हें लेबर कोर्ट की वकालत के क्षेत्र में उतरना पड़ा। प्रखर तर्क शक्ति तथा भाषा पर मज़बूत पकड़ के कारण लेबर कोर्ट के कामयाब वकील के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। माक्र्सवाद का विधिवत अध्ययन न होने के बावजूद वह वर्ग विभाजित समाज में वर्गीय हितों के टकरावों की बारीकियों तथा शोषक तबक़े के हथकंडों से भलीभाॅति परिचित थे।


इस तथ्य से बहुत लोग चकित हो सकते हैं कि चैतरफ़़ा भागदौड़ के बावजूद उनका लेखक तथा कल्चरल ऐक्टिविस्ट अभिन्न रूप से उनसे सम्बद्ध रहा। प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों से उनकी संलग्नता ने जहाॅ इनकी समाजोन्मुखी लेखकीय-दृष्टि को प्रखर किया वहीं उन्हें भारतीय नाट्य संघ के निकट भी ले गयी। चैथे दशक में इप्टा की स्थापना के समय मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन; के नाट्य रूपान्तर, जिसे डाॅ0 रशीद जहाॅ ने संभव बनाया था तथा जिसका मंचन गंगा प्रसाद हाल में हुआ, एम0 शकील ने शराबी भीखू की भूमिका अभिनीत की।

रशीद जहाॅ के रेडियो नाटकों में भी वह प्रमुख पात्र के रूप में मौजूद रहते। संवाद अदा करने का उनका तरीक़ा काफ़ी सराहा जाता। रंगकर्मी के अतिरिक्त कथाकार के रूप में भी उन्होंने निश्चित पहचान बनाई। उनके कहानी संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध आलोचक एहतेशाम हुसैन साहब ने लिखी थी।

उन्होंने चार उपन्यास भी लिखे जो उनकी प्रगतिशील, आधुनिक सोच का आइना है। आशनाई, गिरती दीवारें, एतबार और किरण फूटती है के कथ्य सामाजिक यथार्थ के धागों से ही बुने गये हैं। यह सभी उपन्यास लखनऊ में उस दौर के प्रतिष्ठित प्रकाशक ‘किताबी दुनिया’ ने प्रकाशित किये। उस दौर के प्रचलन से अधिक क़ीमत रखे जाने के बावजूद उनके उपन्यास खूब बिके। ग़ज़ब यह कि उन्होने शायरी में भी हाथ आज़माया। एक उपन्यास के आरंभ में दर्ज यह मशहूर शेर उनकी संघर्षोन्मुखी सोच का ही बिम्ब है –

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