बिहार में कानून व्यवस्था फेल, तेजस्वी बोले-CM बीमार, अपराधी बेखौफ

जुबिली स्पेशल डेस्क

पटना। बिहार में आपराधिक घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ता जा रहा है। बीते एक सप्ताह में हत्या के 17 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिसने राज्य में दहशत का माहौल बना दिया है।

आम लोग डरे हुए हैं और राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। विपक्ष ने इसे लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।

तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार को बताया लाचार

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लगातार पोस्ट करते हुए राज्य सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा “बिहार में अपराध बेलगाम हो चुका है।

कभी पटना में वकील को गोली मारी जाती है, कभी वैशाली में एक युवती की हत्या कर दी जाती है, तो कहीं शिक्षक की हत्या। मुख्यमंत्री बीमार हैं और सरकार लाचार।”तेजस्वी ने कहा कि बिहार में अब गोलियों की बौछार आम बात हो गई है और अपराधी बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा “हर कोई जानता है मुख्यमंत्री की तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन दो बेकार डिप्टी सीएम क्या कर रहे हैं?”

भाजपा नेता की हत्या से मचा राजनीतिक भूचाल

ताज़ा मामला पटना के भाजपा नेता सुरेंद्र केवट की हत्या का है। शेखपुरा में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उन्हें चार गोलियां मारीं।

गंभीर हालत में उन्हें पटना एम्स लाया गया, लेकिन जान नहीं बच सकी। इससे पहले पटना में ही वकील पर गोलीबारी, नालंदा में नर्स की हत्या, और सीतामढ़ी में एक ग्रामीण की हत्या जैसे मामले सामने आ चुके हैं।

कुछ दिन पहले कारोबारी गोपाल खेमका को भी पटना में उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी। इन सिलसिलेवार घटनाओं से बिहार में कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

एनडीए सरकार पर विपक्ष का दबाव, सम्राट चौधरी ने किया खारिज

राज्य में बढ़ते अपराध को लेकर जहां विपक्ष सरकार को घेर रहा है, वहीं उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपराध के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा “बिहार में कोई संगठित अपराध नहीं है। राज्य में कानून का राज कायम है और सुशासन लागू है।

” हालांकि, पटना, शेखपुरा, सीतामढ़ी, वैशाली और नालंदा जैसे जिलों में बार-बार हो रही हत्याओं ने आम जनता की सुरक्षा को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

बिहार में अपराध को लेकर विपक्ष हमलावर है, और आगामी चुनावों से पहले यह मुद्दा चुनावी एजेंडे में सबसे ऊपर आता दिख रहा है। आम लोगों की चिंता, नेताओं के तंज और प्रशासन के दावे तीनों की सच्चाई वक्त बताएगा।

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