इस्लामाबाद वार्ता: क्या ‘मुट्ठी’ में आते-आते फिसल गई शांति?

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लगभग आधी सदी (47 साल) का सबसे बड़ा कूटनीतिक सस्पेंस देखने को मिला। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के इरादे से हुई इस ऐतिहासिक मुलाकात के विफल होने के बाद, ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का दर्द और गुस्सा छलक उठा है।
“बस कुछ इंच की दूरी और बदल गए इरादे”
अराघची ने सोशल मीडिया (X) पर खुलासा किया कि दोनों पक्ष एक समझौते (इस्लामाबाद MoU) के बेहद करीब थे। उन्होंने इसे ‘नेक इरादे’ से की गई पहल बताया, लेकिन आरोप लगाया कि ऐन मौके पर अमेरिका ने अपना रुख बदल लिया।
- अराघची का आरोप: “हम सहमति से बस कुछ ही इंच दूर थे, तभी हमें अनुचित मांगों, बदलते लक्ष्यों और जानबूझकर पैदा की गई बाधाओं का सामना करना पड़ा।”
- सबसे बड़ी बातचीत: यह 1979 की क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच हुई अब तक की सबसे उच्च स्तरीय चर्चा थी, लेकिन अराघची के अनुसार, अमेरिका ने पुरानी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा।
राष्ट्रपति पेजेशकियन का संदेश: “तानाशाही छोड़ें”
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने बातचीत की विफलता के बीच एक उम्मीद की खिड़की खुली रखी है, लेकिन उनके शब्दों में कड़वाहट और स्वाभिमान साफ नजर आया।
“अगर अमेरिकी सरकार अपनी तानाशाही वाली मानसिकता छोड़ दे और ईरानी राष्ट्र के अधिकारों का सम्मान करे, तो समझौते का रास्ता अब भी मुमकिन है।”
उन्होंने वार्ता दल का नेतृत्व करने वाले अपने ‘भाई’ और ईरानी संसद के स्पीकर एम.के. गालिबफ की प्रशंसा करते हुए कहा कि ईरानी पक्ष ने पूरी ताकत और स्पष्टता के साथ अपना पक्ष रखा।
विश्वास का संकट: गालिबफ का नजरिया
ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले स्पीकर गालिबफ ने स्पष्ट किया कि ईरान समझौता तो करना चाहता था, लेकिन उसे वाशिंगटन पर भरोसा कभी नहीं था।
- भविष्योन्मुखी पहल: ईरान ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई नए प्रस्ताव मेज पर रखे थे।
- भरोसे की कमी: गालिबफ के अनुसार, बातचीत का यह दौर इसलिए बेनतीजा रहा क्योंकि अमेरिकी पक्ष ईरानी डेलिगेशन का विश्वास जीतने में पूरी तरह नाकाम रहा।
इस्लामाबाद की यह गुप्त लेकिन महत्वपूर्ण बैठक बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गई है। जहाँ ईरान इसे अमेरिका की ‘अति-महत्वाकांक्षा’ बता रहा है, वहीं दुनिया यह सोच रही है कि आखिर वो कौन सी ‘अंतिम शर्तें’ थीं, जिन्होंने इतिहास बनते-बनते रोक दिया। पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल अब भी मंडरा रहे हैं, और शांति की गेंद एक बार फिर कूटनीति के पाले में है।



