Wednesday - 11 February 2026 - 4:27 PM

UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता: क्या चीन का बदला रुख बदल देगा वैश्विक शक्ति संतुलन?

जुबिली न्यूज डेस्क 

आजादी के बाद से ही भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। दुनिया के कई बड़े देशों का समर्थन मिलने के बावजूद करीब 80 साल बाद भी भारत को स्थायी सीट नहीं मिल सकी। पिछले नौ वर्षों में चीन ने इस दिशा में लाए गए प्रस्तावों को चार बार वीटो कर रोका। हालांकि हाल के दिनों में भारत-चीन संबंधों में आई नरमी और बीजिंग के बदले रुख ने वैश्विक कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। खबरें हैं कि हालिया रणनीतिक बैठक में चीन ने भारत की स्थायी सदस्यता की आकांक्षा को “समझने और सम्मान देने” की बात कही है।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना और भारत की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व शांति के उद्देश्य से हुई थी। भारत शुरुआती हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल था, भले ही उस समय देश स्वतंत्र नहीं हुआ था। सुरक्षा परिषद में पांच देशों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—को स्थायी सदस्य के रूप में वीटो शक्ति दी गई।यह दावा किया जाता है कि 1945 में भारत को स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव मिला था, लेकिन इसे लेकर मतभेद रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में संसद में कहा था कि ऐसा कोई औपचारिक या अनौपचारिक प्रस्ताव भारत को नहीं मिला था।

स्थायी सदस्यता मिलने पर क्या बदलेगा?

यदि भारत को स्थायी सदस्यता और वीटो शक्ति मिलती है तो एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है। अभी एशिया में केवल चीन के पास वीटो है। भारत के जुड़ने से एशिया की आवाज और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।

  • वैश्विक फैसलों में भारत की निर्णायक भूमिका होगी।

  • आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर भारत सीधे प्रस्ताव ला सकेगा।

  • दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन मजबूत होगा।

पाकिस्तान और आतंकवाद पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के स्थायी सदस्य बनने से पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है। अभी तक कई मौकों पर चीन ने पाकिस्तान से जुड़े प्रस्तावों पर वीटो या तकनीकी अड़ंगा लगाया है। भारत के पास वीटो होने से आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति मजबूत होगी।

वीटो पावर क्यों अहम?

सुरक्षा परिषद में किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिए पांचों स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। यदि एक भी देश विरोध में वोट करता है तो प्रस्ताव रुक जाता है—इसे ही वीटो कहा जाता है। यही शक्ति स्थायी सदस्यता को बेहद प्रभावशाली बनाती है।

क्या बढ़ेगी स्थायी सदस्यों की संख्या?

भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील को जी-4 देश कहा जाता है, जो सुरक्षा परिषद के विस्तार और सुधार की मांग करते रहे हैं। अफ्रीकी देशों की भी लंबे समय से मांग है कि उन्हें प्रतिनिधित्व मिले। वर्तमान वैश्विक संतुलन को देखते हुए सुरक्षा परिषद के विस्तार की बहस तेज हो रही है।

भारत के दावे की मजबूती

  • दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र

  • 147 करोड़ से अधिक आबादी

  • वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

  • प्रमुख सैन्य शक्ति

  • शांति मिशनों में सक्रिय योगदान

अगर चीन वास्तव में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है तो यह वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव होगा। हालांकि केवल चीन का समर्थन पर्याप्त नहीं है—UNSC में सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन और व्यापक वैश्विक सहमति जरूरी है। फिर भी, यह संकेत भारत की वैश्विक भूमिका के बढ़ते महत्व और एशिया में बदलते शक्ति समीकरण की ओर इशारा करता है।

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