इंसानियत को बचाने के लिए इमाम हुसैन ने यज़ीद से समझौता नहीं किया

जुबिली न्यूज़ ब्यूरो

नई दिल्ली. पैगम्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन ने अत्याचारी शासक यज़ीद के साथ समझौता करने से इनकार कर पैगम्बर-ए-इस्लाम की शिक्षाओं का प्रचार करने का फैसला किया. इंसानियत को बचाए रखने के लिए हज़रत इमाम हुसैन ने कभी समझौता नहीं किया यहाँ तक कि कर्बला के मैदान में अपनी जान कुर्बान कर दी. यह बात केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने सालार जंग संग्रहालय में आयोजित इमाम हुसैन का मानवता को कर्बला से सन्देश विषय पर हैदरी एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसायटी द्वारा आयोजित सेमिनार में व्यक्त किये.

इस सेमिनार में आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि कोई भी सभ्यता और संस्कृति लम्बे समय तक तभी चलती है जब उसके मानने वाले अपने आदर्श के कामों को याद रखते हैं और उसे जिन्दा रखते हैं. उन्होंने कहा कि कर्बला की जंग को इंसानी ज़िन्दगी के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना बताया. हजरत इमाम हुसैन ने यज़ीद जैसे अत्याचारी राजा से समझौता करने के बजाय अपना बलिदान देना बेहतर समझा. उन्होंने कहा कि इस्लाम की मूल भावना भी यही है कि सबकी भलाई के बारे में सोचो. हक़ और इन्साफ के साथ रहो. भले ही जान चली जाए मगर गलत के साथ मत खड़े हो.

हैदरी एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसायटी की चेयरपर्सन डॉ. फिरदौस फातिमा ने इस मौके पर कहा कि हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद के शासन का बड़ी बहादुरी के साथ विरोध किया और उसे इस्लामी नेता मानने से इनकार कर दिया. हजरत इमाम हुसैन का यह स्पष्ट सन्देश था कि अत्याचारी शासन की मदद करने से आने वाली नस्लों का नुक्सान तय है.

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सोसायटी के महासचिव मीर फिरसथ अली बाकरी ने कहा कि इस्लाम इल्म पर सबसे ज्यादा जोर देता है. मुस्लिम बुद्धिजीवियों को भी समाज के शैक्षिक उत्थान पर जोर देना चाहिए. दिल्ली के मौलाना मतलूब मेहदी आब्दी ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन का बलिदान न सिर्फ लोगों को प्रभावित करता है बल्कि सबसे लम्बे वक्त तक प्रभावकारी रहने वाला बलिदान है.

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