U.P के B.Ed. युवा: डिग्रियों का ढेर, नौकरियों का अकाल

उत्तर प्रदेश, जो अपनी विशाल आबादी के साथ देश की राजनीति और सामाजिक दिशा तय करता है, आज एक गंभीर ‘शैक्षणिक संकट’ के मुहाने पर खड़ा है। यहाँ हर साल लाखों युवा इस उम्मीद में ‘बैचलर ऑफ एजुकेशन’ बी.एड की डिग्री हासिल करते हैं कि वे राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करेंगे। लेकिन हकीकत के धरातल पर, यह डिग्री अब केवल एक कागजी प्रमाण पत्र बनकर रह गई है। उत्तर प्रदेश में B.Ed. की वर्तमान स्थिति शिक्षा के गिरते स्तर, निजी संस्थानों की अनियंत्रित बाढ़ और रोजगार के सिकुड़ते अवसरों का एक ऐसा मिश्रण है, जिसने युवाओं के भविष्य को ‘एजुकेशन पॉल्यूशन’ के धुंधलके में धकेल दिया है।

निजी कॉलेजों की बाढ़ और गुणवत्ता का क्षरण
राज्य में शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विश्लेषण करें तो एक भयानक असंतुलन दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 110 सरकारी और अनुदानित कॉलेज हैं, जबकि निजी कॉलेजों की संख्या 2200 को पार कर गई है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि शिक्षक प्रशिक्षण का पूरा ढांचा अब निजी हाथों में है।
निजीकरण के इस दौर ने शिक्षा को ‘सेवा’ से हटाकर ‘व्यवसाय’ बना दिया है। अधिकांश निजी कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है—न पर्याप्त पुस्तकालय हैं, न स्थायी योग्य शिक्षक और न ही प्रयोगशालाएं। ‘नॉन-अटेंडिंग’ के नाम पर डिग्रियां बेची जा रही हैं, जहाँ छात्र कॉलेज जाए बिना परीक्षा में बैठते हैं और उत्तीर्ण हो जाते हैं। जब प्रशिक्षण की प्रक्रिया ही दोषपूर्ण होगी, तो उससे निकलने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

प्राथमिक शिक्षा से बाहर होना: एक बड़ा झटका
हाल के वर्षों में बी.एड अभ्यर्थियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती कानूनी और नीतिगत बदलाव रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, बी.एड डिग्रीधारकों को प्राथमिक शिक्षक भर्ती (कक्षा 1 से 5) के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर ही सबसे अधिक भर्तियां आती थीं। इस एक निर्णय ने उन लाखों छात्रों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया जिन्होंने प्राथमिक शिक्षक बनने का सपना देखा था।
अब बी.एड धारकों के पास केवल माध्यमिक और उच्च माध्यमिक के विकल्प बचे हैं, जहाँ रिक्तियों की संख्या प्राथमिक के मुकाबले बहुत कम होती है और प्रतियोगिता का स्तर कहीं अधिक कठिन। यह विडंबना ही है कि छात्र भारी निवेश करके डिग्री लेते हैं, और अंत में उन्हें पता चलता है कि उनके लिए अवसरों के आधे दरवाजे पहले ही बंद हो चुके हैं।

बेरोजगारी का चक्रव्यूह और आर्थिक बोझ
उत्तर प्रदेश में युवा बेरोजगारी की दर, विशेषकर 20-29 आयु वर्ग में, काफी चिंताजनक है। बी.एड करने वाले अधिकांश छात्र ग्रामीण या निम्न-मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं। निजी कॉलेजों की फीस, हॉस्टल का खर्च और फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग—कुल मिलाकर एक छात्र पर 2 से 3 लाख रुपये का आर्थिक बोझ पड़ता है।
लेकिन इस निवेश पर ‘रिटर्न’ क्या है?
सरकारी क्षेत्र: भर्तियां नियमित नहीं हैं। विज्ञापन निकलने से लेकर नियुक्ति पत्र मिलने तक में सालों बीत जाते हैं, जो अक्सर कोर्ट-कचहरी के चक्करों में फंस जाते हैं।
निजी क्षेत्र: निजी स्कूलों में बी.एड डिग्रीधारकों का शोषण चरम पर है। उन्हें ₹8,000 से ₹12,000 जैसी मामूली राशि पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जो एक अकुशल मजदूर की दिहाड़ी से भी कम है।

व्यावहारिक प्रशिक्षण का अभाव
एक शिक्षक का निर्माण केवल किताबों से नहीं, बल्कि कक्षा के अनुभव से होता है। बी.एड पाठ्यक्रम में ‘इंटर्नशिप’ या ‘प्रैक्टिस टीचिंग’ का प्रावधान है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह केवल एक औपचारिकता है। निजी कॉलेज अपने छात्रों को स्कूलों में भेजने के बजाय घर बैठे ही डायरी और फाइलें पूरी करने की छूट देते हैं। परिणामस्वरूप, जब ये छात्र वास्तव में कक्षा में खड़े होते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास और शिक्षण कौशल की कमी साफ झलकती है। यह न केवल उनके करियर के लिए घातक है, बल्कि उन स्कूली बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है जिन्हें वे पढ़ाएंगे।

शिक्षण का गिरता सामाजिक स्तर
एक समय था जब शिक्षक बनना समाज में प्रतिष्ठा का विषय था। आज, बी.एड को ‘अंतिम विकल्प’ के रूप में देखा जाने लगा है। जब किसी युवा को कहीं और नौकरी नहीं मिलती, तो वह बी.एड की तरफ रुख करता है। शिक्षण के प्रति जुनून की कमी और केवल नौकरी की मजबूरी ने इस पेशे की गरिमा को कम किया है। इसके लिए वे नीतियां जिम्मेदार हैं जिन्होंने शिक्षक भर्ती को ‘वोट बैंक’ और कॉलेजों को ‘नोट बैंक’ बना दिया है।

भविष्य की राह: क्या सुधार संभव हैं?
यदि हम वास्तव में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को बदलना चाहते हैं, तो हमें सतही सुधारों से आगे बढ़ना होगा:

  1. कठोर नियामक तंत्र: राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद और राज्य सरकार को उन कॉलेजों की मान्यता रद्द करनी चाहिए जो मानक पूरे नहीं करते। केवल कागजों पर कॉलेज चलाने वालों पर आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।
  2. एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम : स्नातक के बाद 2 साल का बी.एड करने के बजाय, 4 साल के एकीकृत कार्यक्रम को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि शिक्षण के प्रति समर्पित युवा ही इस क्षेत्र में आएं।
  3. वार्षिक भर्ती कैलेंडर: सरकार को हर साल निश्चित संख्या में रिक्तियां निकालनी चाहिए, ताकि छात्रों में अनिश्चितता का भाव खत्म हो।
  4. निजी स्कूलों में वेतन मान: जैसे न्यूनतम मजदूरी तय होती है, वैसे ही निजी स्कूलों के शिक्षकों के लिए एक ‘न्यूनतम सम्मानजनक वेतन’ अनिवार्य होना चाहिए।

निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में B.Ed. की वर्तमान स्थिति एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। डिग्री और बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की सुरक्षा घट रही है। यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी है। यदि हमने समय रहते शिक्षक प्रशिक्षण के इस ‘व्यावसायिक प्रदूषण’ को साफ नहीं किया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जिसके पास डिग्रियां तो होंगी, लेकिन ज्ञान और रोजगार का अभाव होगा। शिक्षा के मंदिर को ‘डिग्री की दुकानों’ में तब्दील होने से बचाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और पूर्व कुलपति कानपुर तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय रहे हैं )

Related Articles

Back to top button