“महागठबंधन में दरार! सहनी की शर्तों से तेजस्वी की रणनीति फंसी”

  • बिहार चुनाव से पहले तेजस्वी की अग्निपरीक्षा, महागठबंधन में मची सीटों की खींचतान

जुबिली स्पेशल डेस्क

बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और सियासी तापमान चढ़ चुका है। नीतीश कुमार के खिलाफ महागठबंधन एकजुट होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भीतर ही भीतर दरारें उभरने लगी हैं।

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के दलों के साथ बैठक कर ‘अगस्त क्रांति’ यात्रा का ऐलान किया है, जिसमें वे और राहुल गांधी राज्यभर का दौरा कर सरकार को घेरेंगे। लेकिन सहयोगी दलों के साथ तालमेल अब बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

मुकेश सहनी की ‘दुल्हा’ बनने की ज़िद!

महागठबंधन के सहयोगी विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के नेता मुकेश सहनी बैठक से नदारद रहे और दिल्ली निकल गए। सहनी ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और उपमुख्यमंत्री पद भी मांगा है। उन्होंने कहा, “मैं बाराती नहीं, दूल्हा बनूंगा।” दिलचस्प बात यह है कि वीआईपी के पास फिलहाल विधानसभा में एक भी सीट नहीं है — इसके चार विधायक पहले ही भाजपा में जा चुके हैं।

पुराना रिकॉर्ड, नई मांग

2020 के चुनाव में भी सहनी ने महागठबंधन से 25 सीटें और डिप्टी सीएम पद की मांग की थी, लेकिन बात नहीं बनी। फिर उन्होंने बीजेपी का दामन थामा, मंत्री बने और बाद में टूट गए। अब एक बार फिर वे तेजस्वी की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। गठबंधन के भीतर उनकी बढ़ती मांगों से अंदरूनी समीकरण बिगड़ने लगे हैं।

सीटों पर संग्राम: कौन कितनी सीटें?

राजद ने दावा किया है कि शुरुआती पांच दौर की चर्चा के बाद हर पार्टी ने अपनी पसंदीदा सीटों की सूची सौंप दी है और कोई विवाद नहीं होगा। पर अंदरूनी खींचतान जारी है।

  • कांग्रेस: 2020 में 70 सीटों पर लड़ी, 19 जीतीं। अब करीब 50 सीटों की चाहत है। राहुल गांधी और तेजस्वी साथ में सभाएं करेंगे, लेकिन कांग्रेस ने अब तक तेजस्वी को सीएम फेस घोषित नहीं किया है।
  • CPI: 24 सीटों की मांग कर रही है, हालांकि पिछला प्रदर्शन कमजोर रहा।
  • CPI (ML): पिछली बार 12 सीटें जीती थीं, अब 40-45 सीटें मांग रही है — सबसे अधिक जीत प्रतिशत के आधार पर।
  • CPM: अभी तक सीटों की औपचारिक मांग नहीं की है, लेकिन जो मिलेगी, उस पर लड़ने को तैयार है।

समन्वय बनाना बड़ी चुनौती

विश्लेषकों के मुताबिक, सीटों के असंतुलित बंटवारे से निचले स्तर पर असंतोष पनप सकता है। कई छोटी पार्टियां ऐसी सीटें मांग रही हैं जहां उनकी जमीनी पकड़ बेहद कम है। ऐसे में गठबंधन की जीत की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे राजद की प्रमुख स्थिति बनाए रखें, सहयोगियों की मांगों का संतुलन साधें और एक सधी हुई चुनावी रणनीति तैयार करें। बिहार चुनाव से पहले यह तेजस्वी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बनती दिख रही है।

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