जुबिली स्पेशल डेस्क
चंद्रपुर/मुंबई. राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन—बस वक्त और मौका मायने रखता है। महाराष्ट्र के चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव ने एक बार फिर इस सियासी सच्चाई पर मुहर लगा दी है। चुनाव से पहले एक-दूसरे पर तल्ख हमले करने वाली कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट ने नतीजे आते ही पुराने गिले-शिकवे भुलाकर फिर हाथ मिला लिया है।
चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने महाविकास आघाड़ी (MVA) से अलग होकर ‘एकला चलो’ की नीति अपनाई थी। पार्टी नेताओं का दावा था कि वे अपने दम पर सत्ता हासिल कर लेंगे। इस दौरान कांग्रेस और उद्धव गुट के बीच तीखी बयानबाजी भी हुई, जिससे गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए थे। लेकिन नतीजों ने कांग्रेस के आत्मविश्वास को झटका दे दिया।
त्रिशंकु जनादेश और अंदरूनी खींचतान के चलते कांग्रेस की सत्ता की राह मुश्किल होती नजर आई। भाजपा को सत्ता से दूर रखने और अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए कांग्रेस को आखिरकार यू-टर्न लेना पड़ा। मजबूरी में कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार को मुंबई स्थित ‘मातोश्री’ पहुंचकर उद्धव ठाकरे से समर्थन की गुहार लगानी पड़ी।
मातोश्री में सत्ता का फॉर्मूला तय, ढाई-ढाई साल का समझौता
मातोश्री में हुई अहम बैठक के बाद सत्ता की नई ‘डील’ पर मुहर लग गई। उद्धव ठाकरे गुट ने कांग्रेस को समर्थन देने पर सहमति जता दी है। तय फार्मूले के तहत महापौर पद रोटेशन से दिया जाएगा—ढाई साल कांग्रेस का मेयर रहेगा और बाकी अवधि में उद्धव गुट या सहयोगी दल को मौका मिलेगा। इसके अलावा स्थायी समिति समेत अन्य अहम पदों का भी बंटवारा किया जाएगा।
संजय राउत की सफाई: भाजपा को रोकना मजबूरी
गठबंधन टूटने और फिर जुड़ने पर उठे सवालों के बीच शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने इसे राजनीतिक जरूरत बताया। उन्होंने कहा,“हमारा असली मुकाबला भाजपा से है। अकोला और परभणी में हम साथ हैं। चंद्रपुर में भी अगर साथ नहीं आए, तो भाजपा इसका फायदा उठाएगी।”
राउत ने यह भी दावा किया कि चुनाव अलग-अलग लड़ने के बावजूद उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस के खिलाफ कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया, इसलिए साथ आने में कोई नैतिक बाधा नहीं है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि चुनावी दौर में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच काफी तल्खी देखने को मिली थी।
Jubilee Post | जुबिली पोस्ट News & Information Portal
