मुस्लिम लड़कियों के अपहरण का आह्वान-प्रशासन और अदालतें मौन क्यों?

उबैद उल्लाह नासिर
विगत दिनों भारतीय जनता पार्टी के एक पूर्व विधायक राघवेन्द्र प्रसाद सिंह ने डुमरियागंज में एक सभा को संबोधित करते हुए हिंदू नौजवानों का आह्वान किया कि वे “दो के बदले दस मुस्लिम लड़कियों का अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराएं और उनसे विवाह कर लें”। उन्होंने कहा कि इस कार्य का पूरा खर्च वे खुद उठाएंगे और ऐसे युवाओं को सरकारी नौकरियां भी दिलवाएंगे।
एक टीवी शो में जब उनसे इस बयान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र में उन्होंने यह बयान दिया, वह मुस्लिम-बहुल इलाका है और वहां मुसलमान हिंदू लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म परिवर्तन कराते हैं। इसलिए उन्होंने हिंदू युवाओं को भी ऐसा करने का आह्वान किया।
पहली बात तो यह है कि संघी विचारधारा वाले लोग अपने अस्तित्व से लेकर आज तक मुसलमानों पर ऐसे आरोप लगाते रहे हैं, मानो मुसलमानों के पास यही एक काम बचा हो कि वे हिंदू लड़कियों को फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन कराएं और विवाह करें।
दूसरे, अगर कहीं ऐसी कोई घटना होती भी है, तो उसकी रोकथाम और दोषियों को सज़ा देना पुलिस और अदालत की ज़िम्मेदारी है।

आज के सभ्य समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था में मध्ययुगीन कबीलाई कानून नहीं चलाया जा सकता।
एक पूर्व विधायक को कम से कम इतनी मामूली समझ होनी चाहिए कि वह कानून की मर्यादा का पालन करे। क्योंकि जब कानून बनाने वाले ही गैरकानूनी कृत्य को उकसाने लगें, तो फिर कानून व्यवस्था का क्या होगा?
लेकिन पिछले 10–12 वर्षों में देश की राजनीति का स्वरूप ऐसा हो गया है कि नेता बनने और चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका मुसलमानों को गाली देना बन गया है।
जब प्रधानमंत्री से लेकर गली-मोहल्ले का संघी नेता तक “मुस्लिम विरोध” को राजनीतिक सफलता का मंत्र मानता हो, तो अकेले राघवेन्द्र सिंह को ही दोष नहीं दिया जा सकता।
लोकसभा से लेकर ग्रामसभा तक चुनाव जीतने की रणनीति अब मुस्लिम-द्वेष पर आधारित हो गई है।
संविधान क्या कहता है, कानून क्या कहता है — यह सब बीते ज़माने की बातें लगने लगी हैं।
लोकतंत्र आज “लोक पर तंत्र” की ऑक्टोपस जैसी पकड़ में कराह रहा है। कभी इस देश में लोकतंत्र और कानून व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि प्रधानमंत्री की मामूली सी चूक पर अदालत उसकी सत्ता हिला देती थी।
पुलिस में इतना दम था कि वह गलत पार्किंग पर प्रधानमंत्री की गाड़ी का चालान काट देती थी और प्रधानमंत्री उस अफसर को घर बुलाकर चाय पिलाती थीं, उसकी कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ़ करती थीं।
एक बार साम्प्रदायिक बयान पर चुनाव आयोग ने एक राष्ट्रीय नेता को चुनाव लड़ने के अयोग्य (defranchise) तक घोषित कर दिया था।
आज वह व्यवस्था गर्त में जा चुकी है। पुलिस अब मुख्यमंत्री की वैसे ही “लठैत” बन चुकी है, जैसे पहले जमींदारों के हुआ करते थे जिनका काम हर उस सिर को कुचल देना होता था, जो अन्याय के खिलाफ उठने की हिम्मत करता था।
न संविधान कुछ मायने रखता है, न पुलिस मैन्युअल, न अदालतों के आदेश — बस सत्ता की अंधभक्ति।
सोचिए, राघवेन्द्र सिंह जैसा शर्मनाक, अमानवीय और गैरकानूनी बयान अगर किसी मुसलमान या विपक्षी नेता ने दिया होता, तो क्या उसके घर पर उसी दिन बुलडोज़र नहीं चल जाता?
क्या उसका पूरा परिवार कानून के शिकंजे में नहीं जकड़ लिया जाता?
मगर क्योंकि वह सत्ताधारी दल का नेता है और उसकी विचारधारा से मेल खाता बयान दिया है — इसलिए न पुलिस ने कोई कार्रवाई की, न अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया।
प्रशासन और न्यायपालिका का यह दोहरा मापदंड पूरी न्याय व्यवस्था के लिए खतरा है। बरेली और संभल में मामूली बात पर “तिल का ताड़” बना दिया जाता है, पूरा तंत्र मुसलमानों के पीछे पड़ जाता है। मुख्यमंत्री खुलेआम धमकियाँ देते हैं। लेकिन फतेहपुर में खुलेआम 200 साल पुराने मकबरे पर हमला होता है, कब्रें खोदी जाती हैं, पुलिस पर हमला होता है — फिर भी मामला सिर्फ FIR तक सीमित रह जाता है, क्योंकि यह सब “परिवार” के लोग करते हैं।
विगत दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आफाक अली नामक व्यक्ति की FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।
उसका व्हाट्सएप संदेश था: “मेरे भाई को पुलिस ने सियासी दबाव में गलत फंसा दिया है और हमारे परिवार का बहिष्कार किया जा रहा है।”
उसने न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी जताया था। फिर भी अदालत ने कहा कि यह संदेश “अपने अनकहे शब्दों” से दो सम्प्रदायों के बीच नफरत फैला सकता है।सोचिए जो बात कही ही नहीं गई, अदालत उसी पर निर्णय की बुनियाद बना रही है!लेकिन जहां खुलेआम एक सम्प्रदाय विशेष के नरसंहार और बलात्कार की धमकियाँ दी जा रही हों, वहां पूरा तंत्र खामोश तमाशाई बना हुआ है।
क्या प्रशासन और अदालतें राघवेन्द्र सिंह के बयान से अनभिज्ञ हैं?
क्यों उस पर आज तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई?
मुसलमानों के प्रति खुले दोहरे मापदंड का यह अकेला मामला नहीं है।
देश में मोदी युग की शुरुआत के साथ ही यह सिलसिला शुरू हुआ था और अब हर उस प्रदेश में फैल गया है जहां बीजेपी की सरकार है।
क्योंकि ये सरकारें डॉ. आंबेडकर के संविधान से नहीं, बल्कि गोलवलकर की Bunch of Thoughts से संचालित होती हैं।
संविधान इनके लिए बस एक मुखौटा बनकर रह गया है।
“हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।”



