Wednesday - 18 February 2026 - 6:46 PM

यूपी के रण में अखिलेश की बिसात में उलझी भाजपा

डा. उत्कर्ष सिन्हा

उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति एक ऐसे दिलचस्प मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की लकीरें अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और गहरी होती जा रही हैं। चुनावी आहटों के बीच समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की बदली हुई कार्यशैली और भारतीय जनता पार्टी के भीतर उपजा आंतरिक मंथन इस बात का संकेत है कि आने वाला समय राज्य की सियासत के लिए बेहद निर्णायक होने वाला है।

अखिलेश यादव ने अपनी पारंपरिक राजनीति के खोल से बाहर निकलकर जिस तरह की आक्रामक और सूक्ष्म रणनीतिक शैली अपनाई है, उसने भाजपा के रणनीतिकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। चाहे वह मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर फॉर्म 7 का गंभीर मामला हो या विपक्षी दलों के दिग्गज चेहरों को अपने पाले में लाने की बिसात, अखिलेश हर कदम पर न केवल सचेत हैं, बल्कि सीधे प्रहार करने की मुद्रा में भी नजर आ रहे हैं।

समाजवादी पार्टी का यह रूपांतरण आकस्मिक नहीं है, बल्कि यह पिछले चुनाव परिणामों से सीख लेकर तैयार की गई एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है। अखिलेश यादव अब केवल ट्विटर या प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नेता नहीं रहे, बल्कि वे चुनावी मशीनरी की उन बारीकियों पर ध्यान दे रहे हैं जहाँ अक्सर विपक्ष मात खा जाता था।

फॉर्म 7 के मुद्दे को उठाकर उन्होंने निर्वाचन आयोग और प्रशासन को यह कड़ा संदेश दिया है कि वे मतदाताओं के नाम कटवाने या फर्जी नाम जोड़ने जैसी किसी भी कोशिश को हल्के में नहीं लेंगे। यह सचेतता कैडर के भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा कर रही है, जिससे कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि उनके नेतृत्व के पास अब हर वार का प्रतिवाद मौजूद है। इसके साथ ही, अन्य दलों के कद्दावर नेताओं को पार्टी में शामिल करना यह स्पष्ट करता है कि सपा अब ‘परिवारवाद’ के टैग को पीछे छोड़कर एक व्यापक ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की ओर बढ़ चुकी है।

दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी इस समय अपने ही अंतर्विरोधों के चक्रव्यूह में उलझी हुई नजर आती है। जो भाजपा अपनी अटूट एकजुटता और अनुशासित संगठन के लिए मिसाल दी जाती थी, उसके भीतर अब असंतोष के स्वर सार्वजनिक होने लगे हैं। पार्टी के भीतर के आपसी झगड़े, मंत्रियों और संगठन के बीच का तालमेल बिगड़ना और प्रशासनिक फैसलों पर अपनों के ही सवाल उठाना, भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निसंदेह एक आक्रामक छवि के नेता हैं और उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता कुछ वर्गों में अभी भी बरकरार है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि भाजपा के पास अब वोटरों को गोलबंद करने के लिए ‘हिंदुत्व’ के सिवा कोई प्रभावी हथियार नहीं बचा है। विकास के दावों और डबल इंजन सरकार के नारों के बीच जब युवाओं के भविष्य से जुड़े ‘UGC प्रकरण’ और पेपर लीक जैसे मामले सामने आते हैं, तो हिंदुत्व की वह धार भी कुंद पड़ने लगती है जो कभी भाजपा का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हुआ करती थी।

धार्मिक मोर्चे पर भी स्थितियाँ भाजपा के लिए उतनी सहज नहीं रह गई हैं जितनी पहले थीं। शंकराचार्य प्रकरण और धार्मिक गुरुओं के बीच उभरे मतभेदों ने उस नैरेटिव को प्रभावित किया है, जिसे भाजपा ने पिछले एक दशक में बड़े जतन से गढ़ा था। जब आस्था के केंद्र और धार्मिक संस्थाएं सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती हैं, तो उसका सीधा असर उन पारंपरिक वोटरों पर पड़ता है जो धर्म और राजनीति के संगम को भाजपा की सबसे बड़ी ताकत मानते थे। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई ने संगठन को भीतर से कमजोर किया है। पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी और दूसरे दलों से आए नेताओं को दी जा रही तरजीह ने भाजपा के भीतर एक मनोवैज्ञानिक दरार पैदा कर दी है, जिसे भरने में मुख्यमंत्री योगी और शीर्ष नेतृत्व को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

अखिलेश यादव ने इस स्थिति को भाँपते हुए अपनी ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की रणनीति को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। PDA का यह फॉर्मूला केवल एक गठबंधन नहीं है, बल्कि यह भाजपा की ‘हिंदुत्व’ आधारित गोलबंदी के खिलाफ एक ‘जातीय गोलबंदी’ का काउंटर है।

अखिलेश जानते हैं कि अगर वे गैर-यादव पिछड़ों और दलितों के एक बड़े हिस्से को यह समझाने में सफल रहे कि भाजपा के शासन में उनकी भागीदारी कम हुई है, तो वे भाजपा के उस बड़े वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं जिसने मोदी-योगी के दौर में भाजपा को ऐतिहासिक जीतें दिलाई थीं। अखिलेश यादव की रैलियों और बयानों में अब केवल विकास की बातें नहीं होतीं, बल्कि वे जातीय जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दों को उठाकर सीधे तौर पर उन वर्गों को साध रहे हैं जो खुद को व्यवस्था से कटा हुआ महसूस कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की इस चुनावी जंग में मुद्दे अब भावनात्मक से हटकर भागीदारी और सुरक्षा पर केंद्रित होते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी आक्रामकता से यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक गौरव के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे, लेकिन बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्न अब उनकी इस आक्रामकता पर भारी पड़ रहे हैं। वहीं अखिलेश यादव ने खुद को एक ऐसे परिपक्व नेता के रूप में पेश किया है जो अब केवल प्रतिवाद नहीं करता, बल्कि विकल्प भी पेश करता है। उनका हर कदम भाजपा की कमजोरी को उजागर करने और अपनी मजबूती को बढ़ाने की दिशा में केंद्रित है।

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात अब पूरी तरह बिछ चुकी है। एक तरफ अखिलेश यादव का ‘सचेत और आक्रामक’ विपक्ष है जो पीडीए के सहारे जातीय दुर्ग को मजबूत कर चुका है, तो दूसरी तरफ भाजपा है जो अपने आंतरिक कलह और प्रशासनिक चुनौतियों से पार पाने की जद्दोजहद में है। हिंदुत्व का कार्ड अभी भी भाजपा का ब्रह्मास्त्र है, लेकिन क्या यह ब्रह्मास्त्र बेरोजगारी, महंगाई और आंतरिक अंतर्विरोधों के दबाव को झेल पाएगा? यह एक बड़ा सवाल है। आने वाले चुनावों में जीत उसी की होगी जो मतदाता की बदलती नब्ज को बेहतर तरीके से पढ़ पाएगा और उसे यह विश्वास दिला पाएगा कि वह केवल सत्ता का भूखा नहीं, बल्कि उनके हितों का सच्चा रक्षक है। अखिलेश यादव फिलहाल इस रेस में खुद को बहुत सावधानी और आक्रामकता के साथ आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे भाजपा की राहें पहले के मुकाबले काफी कठिन हो गई हैं।

Radio_Prabhat
English

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com