डा. उत्कर्ष सिन्हा
बांग्लादेश की राजनीति में 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए हैं। यह चुनाव न केवल 2024 के छात्र आंदोलन के बाद की राजनीतिक अस्थिरता का परीक्षण था, बल्कि देश की जनता की आकांक्षाओं का आईना भी। चुनाव परिणामों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतों को सीमित सफलता मिली। छात्र आंदोलन से उभरी नई पार्टियां और मुहम्मद युनुस के समर्थक भी मैदान से बाहर हो गए, जो दर्शाता है कि बांग्लादेशी जनता ने स्थापित राजनीतिक ताकतों पर ही भरोसा जताया है। यह परिणाम न केवल धार्मिक कट्टरपंथ को नकारते हैं, बल्कि देश की समावेशी संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुष्टि भी करते हैं। हालांकि, इन नतीजों के क्षेत्रीय प्रभाव, विशेषकर पाकिस्तान के प्रभाव में कमी और भारत के लिए निहितार्थ, पर गहन विचार की जरूरत है।
चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए सबसे पहले ध्यान जाता है जनता के कट्टरपंथ विरोधी रुख पर। जमात-ए-इस्लामी, जो लंबे समय से इस्लामी कट्टरवाद और पाकिस्तान-समर्थित एजेंडे से जुड़ी रही है, जिसे इस चुनाव में करारी हार मिलीं। 2024 के छात्र आंदोलन के बाद जब शेख हसीना की सरकार गिर गई और मुहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार बनी, तो जमात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया था। कई विश्लेषकों को आशंका थी कि यह कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करेगा, लेकिन जनता ने ऐसा नहीं होने दिया। बीएनपी ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जो दर्शाता है कि मतदाताओं ने बांग्लादेश के समावेशी और राष्ट्रवादी राजनीति को प्राथमिकता दी। जमात की सीटें मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में आईं, जहां धार्मिक भावनाओं का प्रभाव अधिक है, लेकिन शहरी और युवा मतदाताओं ने उन्हें सिरे से नकार दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि आम बांग्लादेशी मजहबी कट्टरपंथ के साथ नहीं है। वे अपनी समावेशी बंगाली संस्कृति, जो हिंदू-मुस्लिम सद्भाव और उदारवाद पर आधारित है, को बनाए रखना चाहते हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना, जो पाकिस्तानी दमन के खिलाफ थी, आज भी जीवित है और इन नतीजों में झलकती है।

इसी क्रम में, छात्र आंदोलन के बाद उभरी पार्टियों की हार भी विचारणीय है। 2024 के आंदोलन, जो नौकरी कोटे के खिलाफ शुरू हुआ और हसीना सरकार के पतन में बदल गया, ने कई नई राजनीतिक इकाइयों को जन्म दिया। नेशनल सिटिजंस पार्टी (एनसीपी) जैसी पार्टियां, जो छात्र नेताओं द्वारा गठित थीं, को मात्र 2-3 सीटें मिलीं। यह हार दर्शाती है कि आंदोलन की ऊर्जा चुनावी सफलता में नहीं बदल सकी। युवा मतदाता, जो आंदोलन का मुख्य आधार थे, ने स्थापित पार्टियों जैसे बीएनपी पर भरोसा जताया।
इसी तरह, मुहम्मद युनुस, जो अंतरिम सरकार के प्रमुख थे और नोबेल विजेता के रूप में सम्मानित, के समर्थकों को भी करारा झटका लगा। युनुस की सरकार को कई सुधारों का श्रेय मिला, लेकिन चुनावी मैदान में उनके सहयोगी या समर्थित उम्मीदवार असफल रहे। यह बताता है कि बांग्लादेशी जनता तात्कालिक आंदोलनों या व्यक्तिगत करिश्मे से अधिक, अनुभवी और स्थापित राजनीतिक ताकतों पर विश्वास करती है। बीएनपी, जो खालिदा जिया की विरासत पर खड़ी है, ने इस विश्वास को जीता। तारिक रहमान, जो लंदन से निर्वासन में रहकर पार्टी चला रहे थे, अब प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं।
इन नतीजों को समझने के लिए शेख हसीना के शासनकाल की तुलना आवश्यक है। शेख हसीना की अवामी लीग ने 2009 से 2024 तक शासन किया, लेकिन अंतिम वर्षों में उनकी शैली तानाशाहीपूर्ण हो गई थी। 2024 के चुनाव में वोटर टर्नआउट मात्र 41.8% था, जो विपक्ष के बॉयकॉट और दमन के आरोपों के कारण था। हसीना पर आरोप थे कि उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित किया, मीडिया को दबाया और विपक्षी नेताओं को जेल में डाला। कम टर्नआउट दर्शाता था कि जनता में असंतोष था और लोकतंत्र नाममात्र का रह गया था। इसके विपरीत, 2026 चुनाव में टर्नआउट 59.44% पहुंचा, जो स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत है। युनुस सरकार ने चुनाव सुधार किए, जैसे मतदाता सूची की सफाई और स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, जिसने जनता का विश्वास बहाल किया। हालांकि, हिंसा के कुछ मामले सामने आए, लेकिन कुल मिलाकर चुनाव शांतिपूर्ण रहे। यह बदलाव हसीना की तानाशाही से मुक्ति का प्रतीक है और दर्शाता है कि बांग्लादेशी जनता लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी चाहती है।
अब, इन नतीजों के क्षेत्रीय निहितार्थ पर विचार करें। पाकिस्तान का बांग्लादेश पर प्रभाव, विशेषकर जमात-ए-इस्लामी के माध्यम से, लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। जमात को पाकिस्तानी आईएसआई का समर्थन माना जाता है, जो कट्टरपंथी नेटवर्क को मजबूत करता है। हसीना के समय में जमात पर प्रतिबंध था, लेकिन युनुस सरकार ने इसे हटा लिया, जिससे पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ने की आशंका थी। हालांकि, चुनाव परिणामों में जमात की सीमित सफलता से पाकिस्तान का ‘दखल’ (प्रभाव) कम होने की संभावना है। बीएनपी सरकार यदि जमात को गठबंधन में शामिल नहीं करती, तो कट्टरपंथी एजेंडे पर अंकुश लग सकता है। बीएनपी का इतिहास जमात से गठबंधन का रहा है, लेकिन इस चुनाव में वे अलग लड़े। नई सरकार यदि सेकुलर नीतियां अपनाए, तो पाकिस्तानी हस्तक्षेप कम होगा, विशेषकर सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर। यह बांग्लादेश की संप्रभुता को मजबूत करेगा।
भारत के लिहाज से ये नतीजे मिश्रित हैं, लेकिन कुल मिलाकर सकारात्मक। शेख हसीना भारत-समर्थक थीं और दोनों देशों के बीच आर्थिक-सुरक्षा संबंध मजबूत थे। बीएनपी का इतिहास भारत-विरोधी रहा है, विशेषकर खालिदा जिया के समय में। जमात की मौजूदगी से अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमलों की आशंका बढ़ सकती है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, बीएनपी की जीत स्थिरता लाएगी, जो भारत के लिए फायदेमंद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई दी, जो सकारात्मक संकेत है। भारत को नई सरकार के साथ संबंध मजबूत करने चाहिए, विशेषकर व्यापार, जल-साझेदारी और सीमा सुरक्षा पर। यदि बीएनपी कट्टरपंथ को नियंत्रित रखे, तो यह भारत-पाकिस्तान की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में भारत के पक्ष में जाएगा।
2026 चुनाव बांग्लादेश के लिए नई शुरुआत हैं। जनता ने कट्टरपंथ को नकारकर समावेशी विकास का रास्ता चुना है। यह लोकतंत्र की जीत है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं—आर्थिक सुधार, अल्पसंख्यक सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन। नई सरकार को इन पर ध्यान देना होगा, ताकि बांग्लादेश अपनी बंगाली पहचान के साथ आगे बढ़ सके।
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