ओली के ‘हैट्रिक मंडेट’ के बाद नेपाल की सत्ता राजनीति किस ओर मुड़ेगी?

डा. उत्कर्ष सिन्हा
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के हालिया आंतरिक चुनावों में केपी शर्मा ओली खेमे की बड़ी जीत और ईश्वर पोखरेल समूह की करारी हार का असर केवल संगठनात्मक समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले सालों में नेपाल की समूची सत्ता-समीकरण, वाम राजनीति, विपक्ष की संरचना और भारत–चीन जैसे बाहरी सम्बन्धों तक फैलेगा। यह जीत उस समय आई है जब ओली पहले ही कई बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और उनकी पार्टी सत्ता की ‘म्यूज़िकल चेयर’ वाली राजनीति में बार–बार निर्णायक शक्ति के रूप में उभरी है, इसलिए यूएमएल के भीतर उनका फिर से वर्चस्व स्थापित होना राष्ट्रीय राजनीति में भी गहरे प्रभाव डालेगा। इस बार उनके साथ नेपाल की राजनीती में एक प्रभावी बड़ा चेहरा राम कुमारी झाख्री भी होंगी ।
इस जीत ने उनके धुर विरोधी विद्या देवी भंडारी के मनोबल को तोड़ दिया है । जो इश्वर पोखरेल के जरिये ओली के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रही थी ।
यूएमएल के भीतर शक्ति संतुलन
यूएमएल की 11वीं जनरल कन्वेंशन में 2200 से अधिक डेलिगेट्स ने नई लीडरशिप के लिए मतदान किया, जिसमें पार्टी चेयर के रूप में ओली को ईश्वर पोखरेल की तुलना में भारी बढ़त मिली। इससे संकेत साफ है कि संगठन का बहुमत अभी भी ओली की नेतृत्व शैली, उनके आक्रामक व्यक्तित्व और चुनाव जिताऊ क्षमता पर भरोसा करता है, भले ही युवाओं के आंदोलनों और सत्ता में उनके विवादित कार्यकाल ने उनकी लोकप्रियता पर गंभीर सवाल उठाए हों। पोखरेल खेमा यह उम्मीद लगाए बैठा था कि असंतुष्ट नेता, पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी और कुछ प्रांतों में उनकी पकड़ उन्हें मजबूत चुनौती देगी, लेकिन नतीजों ने दिखा दिया कि पार्टी कैडर के स्तर पर ‘एंटी-ओली कंसेंसस’ अभी तैयार नहीं हो पाया।
ईश्वर पोखरेल की हार के बावजूद उनके कुछ साथियों का केन्द्रीय कमेटी या अन्य पदों पर जीत जाना यह दर्शाता है कि यूएमएल के भीतर एक ‘कमज़ोर लेकिन मौजूद’ वैकल्पिक धारा जिंदा रहेगी। यही धारा भविष्य में या तो ओली के भीतर से सुधार की कोशिश करेगी, या किसी बड़े राजनीतिक झटके की स्थिति में अलग ध्रुव के रूप में फिर से सक्रिय हो सकती है।
नेतृत्व शैली: केंद्रीकरण बनाम आंतरिक लोकतंत्र
ईश्वर पोखरेल गुट ने खुले तौर पर कहा था कि विधान संशोधन और डेलिगेट चयन की प्रक्रिया ओली की डिज़ाइन को सूट करती है और विरोधी स्वरों को संस्थागत रूप से कमज़ोर करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। ऐसे में इस चुनावी जीत से ओली को जो नैतिक वैधता मिली है, वह उन्हें आने वाले वर्षों में और अधिक केंद्रीकरण की ओर प्रेरित कर सकती है, क्योंकि वे यह तर्क दे पाएँगे कि पार्टी कार्यकर्ता भी उनकी ‘सख़्त अनुशासनवादी लाइन’ के साथ हैं।

दूसरी ओर, पोखरेल और उनके समर्थक अब यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने ‘प्रिंसिपल्ड डिसेंट’ के रूप में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक बहस ज़िंदा रखी, क्योंकि उन्होंने हार के बावजूद पार्टी नहीं छोड़ी और अलग पार्टी बनाने की राह नहीं पकड़ी। यह उनके लिए पूँजी है, जिसका इस्तेमाल वे भविष्य में तब कर सकते हैं जब ओली किसी बड़े राजनीतिक या नैतिक संकट में घिरें, जैसे भ्रष्टाचार, युवाओं के दमन या संविधान संसोधन जैसे विवादित मुद्दों पर।
राष्ट्रीय सत्ता–समीकरण पर असर
ओली पहले ही नेपाल की राजनीति में ‘पॉलिटिकल सर्वाइवर’ के रूप में जाने जाते हैं, जो कई बार सत्ता से बेदखल होने के बाद भी गठबंधनों की नई इंजीनियरिंग कर के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक लौटते रहे हैं। 2022 के चुनावों के बाद भी यूएमएल और नेपाली कांग्रेस, दोनों सबसे बड़े दल बनकर उभरे और बाद के महीनों में ओली ने कभी माओवादी केंद्र के साथ, तो कभी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकारें बनाने और गिराने में केन्द्रीय भूमिका निभाई। ऐसी स्थिति में, यूएमएल के भीतर उनकी पकड़ मज़बूत होने का सीधा अर्थ यह है कि भविष्य के किसी भी गठबंधन–वार्ता में ओली व्यक्तिगत रूप से और अधिक निर्णायक होंगे, क्योंकि पार्टी के भीतर से उन्हें चुनौती देने वाली आवाज़ें अब और हाशिए पर चली गई हैं।
इसका दूसरा पहलू यह है कि विपक्ष या गठबंधन साझेदारों के लिए यूएमएल के अंदर ‘सॉफ्ट कॉन्टैक्ट’ रखने वाले नेताओं—जैसे ईश्वर पोखरेल या उनके करीबी—की bargaining power घटेगी। जब किसी पार्टी में एक ही नेता पूर्ण वर्चस्व के साथ खड़ा होता है, तो बाहरी दलों को भी पता होता है कि असली बातचीत और ‘डील’ उसी से करनी है, जिससे अन्ततः सत्ता–साझेदारी की राजनीति अधिक personalised हो जाती है और नीति–स्तर की सहमति या दलों के बीच कार्यक्रमगत गठबंधन की परंपरा कमजोर पड़ती है।
वाम राजनीति और कम्युनिस्ट ध्रुवीकरण
नेपाल की कम्युनिस्ट राजनीति पिछले दशक में लगातार विखंडन, पुनर्गठन और गठबंधन–राजनीति के बीच झूलती रही है, जिसमें कभी यूएमएल और माओवादी केंद्र का एकीकरण हुआ, फिर टूट हुआ, फिर सरकार में साझेदारी बनी और फिर गिरावट आई। ओली की मज़बूत वापसी से वाम ध्रुव के भीतर दो संभावित प्रवृत्तियाँ उभर सकती हैं:
- एक, यूएमएल एक अपेक्षाकृत स्थिर और अनुशासित वाम दल के रूप में उभर कर माओवादियों से अलग अपनी पहचान मज़बूत करे।
- दो, यदि ओली अवसरवादी ढंग से गठबंधन राजनीति खेलते हैं तो वे कभी माओवादियों, कभी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर वाम राजनीति को विचारधारा की बजाय सत्ता–गणित का साधन बना सकते हैं।
ईश्वर पोखरेल की हार का मतलब यह भी है कि यूएमएल के अंदर वह लाइन कमजोर हुई है जो पार्टी को अधिक संस्थागत, सामूहिक नेतृत्व और ‘गार्डियन रोल’ वाले चेयर की ओर ले जाना चाहती थी, जैसा खुद पोखरेल ने सुझाव दिया था कि ओली सक्रिय राजनीति से थोड़ा पीछे हटकर पार्टी के संरक्षक की भूमिका लें। नतीजतन, यूएमएल में विचारधारात्मक बहस की बजाय व्यक्तिवादी ध्रुवीकरण आगे भी हावी रहने की संभावना है, जहाँ ओली समर्थक बनाम एंटी–ओली धाराएँ राजनीति का मुख्य फ्रेम तय करेंगी।
युवाओं, आंदोलनों और लोकतांत्रिक असंतोष पर प्रभाव
ओली के पिछले कार्यकाल की सबसे बड़ी त्रासदी युवाओं के आंदोलनों पर दमन और सोशल मीडिया बैन जैसे फैसले रहे, जिनके चलते कई प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और उन्हें अंततः पद से हटना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में यूएमएल के कार्यकर्ता यदि फिर से उन्हें भारी बहुमत देते हैं, तो यह संदेश भी जाता है कि पार्टी अभी उस जन–आक्रोश को पूरी तरह ‘इंटरनलाइज़’ नहीं कर पाई है, बल्कि उसे एक अस्थायी व्यवधान मानकर आगे बढ़ रही है। इससे युवाओं और सिविल सोसायटी में यह बेचैनी बढ़ सकती है कि मुख्यधारा के दल अब भी accountability की बजाय ‘इलेक्टोरल मैनेजमेंट’ के ज़रिये नेतृत्व को वैधता देते हैं।
हालाँकि, यह भी सम्भव है कि ओली इस आंतरिक जीत को ‘लास्ट चांस’ की तरह लेकर अपनी इमेज को कुछ हद तक सुधारने की कोशिश करें, जैसे भ्रष्टाचार विरोधी और रोज़गार–मुखी एजेंडा, बेहतर गवर्नेंस, और डिजिटल अधिकारों पर कुछ नरम रुख दिखाकर युवाओं को दोबारा अपने पक्ष में लाने की कोशिश करें। लेकिन उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यह भरोसा आसान नहीं होगा और विपक्ष—खासकर माओवादी केंद्र और अन्य मध्यमार्गी दल—इसका लगातार राजनीतिक इस्तेमाल करते रहेंगे।
भारत–चीन और क्षेत्रीय कूटनीति
ओली की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही है, जिसने एक तरफ़ चीन के साथ घनिष्ठता बढ़ाई, तो दूसरी तरफ़ भारत के साथ बाद के चरणों में उन्होंने व्यावहारिकता दिखाते हुए भारतीय नेतृत्व से रिश्ते सुधारने की कोशिश भी की और साथ ही नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर ‘नेशनल कंसेंसस’ सरकार की बात की, जो दिखाता है कि विदेश नीति के मोर्चे पर वे वैचारिक से अधिक प्रैग्मेटिक हैं। यूएमएल के भीतर उनकी मज़बूत स्थिति का अर्थ यह है कि भविष्य में नेपाल की विदेश नीति में भी उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ भारी पड़ेंगी, चाहे वह चीन के निवेश प्रोजेक्ट हों या भारत–नेपाल व्यापार, जल–संसाधन और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे।
ईश्वर पोखरेल का गुट, जो कुछ हद तक अलग टोन और internal democracy पर ज़ोर दे रहा था, यदि कमज़ोर होता है तो विदेश नीति पर आंतरिक बहस भी सिमट सकती है और रणनीतिक साझेदारी के निर्णय एक सीमित सर्कल में लिए जाएँगे। इससे क्षेत्रीय स्तर पर भी संकेत जाएगा कि नेपाल में फिर से ‘ओली सेंट्रिक’ दौर लौट रहा है, जिसमें बीजिंग और नई दिल्ली दोनों को डील उसी एक चेहरे से करनी होगी, न कि किसी व्यापक वाम मोर्चे या सामूहिक नेतृत्व से।
भविष्य की चुनौतियाँ और संभावित परिदृश्य
ओली के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब पार्टी के भीतर असंतोष को प्रबंधित करना है, क्योंकि चुनावी हार के बावजूद ईश्वर पोखरेल और उनके समर्थक पूरी तरह गायब नहीं हुए हैं, बल्कि वे ‘organized dissent’ के रूप में अंदर मौजूद रहेंगे। यदि ओली उन्हें केवल साइडलाइन करने की रणनीति अपनाते हैं, तो भविष्य में पार्टी–स्प्लिट, विद्रोह या किसी नए गठबंधन के ज़रिये उनके खिलाफ़ मोर्चाबंदी की सम्भावना बनी रहेगी, खासकर तब जब वे सरकार में लौटकर फिर से विवादित फैसले लें।
नेपाल की व्यापक राजनीति के लिए यह परिणाम एक ओर स्थिरता का संकेत है—क्योंकि एक बड़ा दल स्पष्ट नेतृत्व के साथ सामने आया है—तो दूसरी ओर यह ख़तरा भी बढ़ाता है कि वही पुरानी व्यक्तिवादी, सत्ता–केन्द्रित राजनीति, जिसमें गठबंधन बनाना और गिराना मुख्य खेल है, फिर से हावी रहेगी। इस अर्थ में, यूएमएल के भीतर ओली की यह बड़ी जीत नेपाल की लोकतांत्रिक यायावरी की कहानी का नया अध्याय है, जिसमें स्थिरता और अस्थिरता, दोनों की संभावनाएँ साथ–साथ चलती दिखती हैं, और बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि ओली अपनी इस जीत को सुधार के अवसर में बदलते हैं या इसे केवल शक्ति–प्रदर्शन का औज़ार बनाकर पुराने रास्ते पर ही चलते हैं



