राज्यपालों की भूमिका पर फिर उठ रहे सवाल

तमिलनाडु में राज्यपाल की ओर से जिस तरह सबसे बड़े दल टीबी के को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश हो रही है, उससे फिर एक बार भारत में राज्यपालों की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है।

यह कहना मुश्किल है कि राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ऐसा स्वयं कर रहे हैं या केंद्र सरकार के इशारे पर? लेकिन चूंकि राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र में सत्तारूढ़ दल की अनुकंपा पर ही होता है इसलिए राज्यपालों को केंद्र सरकार की कठपुतली भी कह सकते हैं।

पूर्व में एक नहीं दर्जनों ऐसे उदाहरण है जब राज्यपालों ने केंद्र सरकार की मर्जी पर ही काम किया है।

तमिलनाडु में भाजपा का केवल एक विधायक है तो क्या इसी एक को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश हो रही है? यदि हां तो राजयपाल को सर्वाधिक 108 विधायकों वाली पार्टी को बहुमत सिद्ध कर पाने में संदेह है तो एक अकेले पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? और वहां जिस गठबंधन में भाजपा है वह पार्टी भी बहुमत से कोसों दूर है।

एक्टर से नेता बने थलापति विजय के नेतृत्व में टीबी के को बहुमत सिद्ध करने के लिए केवल आठ विधायकों की जरूरत है। कांग्रेस ने विजय की पार्टी को अपना समर्थन दे दिया है। डीएमके चीफ व निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विजय को सरकार बनाने में किसी भी रुकावट को नामंजूर कर दिया है,दो तीन छोटी पार्टियों के विधायकों के समर्थन मिलने की पूरी संभावना भी है बावजूद राज्यपाल की ओर से यह रुकावट समझ से परे है। राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर यह तो जानते ही होंगे कि किसी मुख्यमंत्री को बहुमत सिद्ध करने की जगह राजभवन नहीं विधानसभा मंडप होता है।
पूर्व में राज्यपालों की ऐसी हठधर्मिता पर न्यायालय से भी दिशा निर्देश पारित किए गए हैं इसमें एस आर बोम्मई का मामला सुर्खियों में रहा है। फिलहाल तमिलनाडु के राज्यपाल का किसी दल की सरकार को रोकने को लेकर केंद्र सरकार पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।


प्रदेशों में यदि केंद्र सरकार के मनमाफिक सरकार नहीं है तो राज्यपालों द्वारा उसे तंग करने या बर्खास्त तक कर देने के ढेरों उदाहरण है ।आजादी के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास के अंदर झांके तो केंद्र सरकार द्वारा राज्यपालों के अपने तरीके से इस्तेमाल करने के उदाहरण बहुतेरे हैं। ऐसे भी उदाहरण है जब उनके जबरदस्ती की रिपोर्ट पर अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर सरकारें गिरा दी गई।
राज्यपालों के मनमानी के अजीब मामले देखे गए। राजस्थान का मामला याद होगा जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राज्य पाल कलराज मिश्र के घेराव तक का ऐलान करना पड़ा था। राज्यपाल प्रदेशों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं लेकिन इन्हीं में से सत्य पाल मलिक जैसे राज्य पाल भी होते हैं जो सरकार से टकराते भी हैं। प्रदेशों में केंद्र सरकार द्वारा नामित राज्यपालों का उपयोग केंद्र सरकार ऐसे प्रदेशों में खूब करती हैं जहां उनके दल की सरकार नहीं होती है। यह परंपरा नई नहीं है। पूर्व में कई प्रदेशों में राज्यपालों की भूमिका पर उठ रहे सवालों से पता चला है कि किस तरह कठपुतली की तरह उनका इस्तेमाल किया गया है।

कठपुतली की तरह राज्यपालों के इस्तेमाल की शुरूआत नेहरू के शासन काल से ही हो चुकी थी। उसके बाद जैसे राज्यपालों को ताश के पत्ते की तरह फेंटने की परंपरा ही चल पड़ी। हैरत है तमाम राज्यपाल अपनी गरिमा की तनिक भी परवाह किए बिना वह सब करते रहे जो केंद्र सरकार की मर्जी रही। उदाहरण के तौर पर हरियरणा में जेडी तपासे,सिक्किम में तलयार खान, जम्मू कश्मीर में जगमोहन और ऐसे ही उस काल के तमाम राज्यपालों का स्मरण किया जा सकता है।
राज्यपालों के केंद्र सरकार के प्रति अंधभक्ति की वजह से कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे राम कृष्ण हेगड़े ने अपने यहां के तत्कालीन राज्यपाल एएन बनर्जी को केंद्र सरकार का नौकर तक कह डाला था तो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रामलाल को लोग गुंडा बेइमान और डकैत तक कहने से बाज नहीं आए थे। कांग्रेस के शासन काल में राज्यपालों को मोहरा बनाए जाने के ढेरों उदाहरण है। भाजपा ने राज्यपालों का सर्वाधिक उपयोग प्रदेशों में दूसरे दलों की सरकार गिराकर एन केन प्रकारेण अपनी सरकार बनाने में किया।

सिक्किम,मेघालय,मिजोरम,नागालैंड,गोवा जैसे प्रदेशों में बीजेपी के शून्य से लेकर 01,02,12,व 13 विधायक चुने गए थे। बीजेपी की यह सदस्य संख्या सरकार क्या विपक्ष के लायक भी नहीं थी लेकिन राज्यपालों ने वहां उनकी सरकार बनवाने में भरपूर मदद की थी।
कहते हैं कि नेहरू शासन काल में राज्यपालों का वेजा इस्तेमाल नहीं किया जाता था और जनतात्रिक मूल्यों की रक्षा हो रही थी।लेकिन यह बताने की जरूरत नहीं है कि नेहरू के कार्याकाल में अधिकांश प्रदेशीय सरकार भी कांग्रेस की ही हुआ करती थी। इसलिए सरकार गिराने या बनाने में राज्यपालों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं महसूस हुई।लेकिन नेहरू काल के जनतांत्रिक होने का भी भ्रम 1959 में तब टूट गया जब केरल की इएमएस नंबूदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार को एक दम अनुचित ढंग से गिरा दिया गया।उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती इंदरा गांधी थीं जिनका केरल में कानून व्यवस्था की बिगड़ी हाल के बहाने केरल सरकार गिराए जाने का समर्थन था।नेहरू तब इस ओर से आंख बंद किए रहे।बताने की जरूरत नहीं कि आपातकाल के बाद 1980 में वापस लौटीं श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन काल में आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल रामलाल ने कैसे बर्खास्त किया था? इंदरा गांधी का यह ऐसा शासन काल था जब राज्यपालों का खूब मनमाना इस्तेमाल हुआ।
राज्यपालों के संदर्भ में पूर्व की स्थिति की पूनरावृत्ति की कल्पना फिलहाल भाजपा शासनकाल में नहीं की गई थी।

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