क्या ख़ुफ़िया एजेंसियाँ जलवायु को हथियार बना रही हैं?

आज‑कल सोशल मीडिया के ज़रिए एक ऐसा भय‑मिश्रित विचार फैल रहा है जो विज्ञान, इतिहास और राजनीति को एक ही दायरे में दबा देता है: वह विचार यह है कि अमेरिकी या अन्य वैश्विक शक्तियों की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ – विशेषकर CIA – “जलवायु” को अपना हथियार बना चुकी हैं ?  वे बाढ़, सूखा और अचानक आने वाली भीषण बरसात को रिमोट‑कंट्रोल कर रही हैं और इसके ज़रिए दुनिया के राजनीतिक‑आर्थिक नक़्शे को नियंत्रित कर रही हैं। डिक्लासिफाइड फाइल्स, वियतनाम युद्ध के दौरान बारिश को हथियार बनाने के दस्तावेज़, और हाल ही में ईरान में अचानक जलाशयों के भरने की ख़बरें – इन सबको एक‑दूसरे से जोड़कर एक ऐसा दृश्य सामने आ  रहा है जिसमें जलवायु और राजनीति के बीच का अंतर लगभग घुल‑मिल जाता है। सवाल यह है कि इन दावों में कितना तथ्य है, कितना ड्रामा और कितना वैज्ञानिक अज्ञान पर आधारित भय ?

इतिहास यह तो काफ़ी हद तक स्पष्ट तरीके से कहता है कि सेनाओं और सत्ताधारियों ने मौसम को कभी‑कभी “हथियार‑स्तर” पर इस्तेमाल करने की कोशिश ज़रूर की है। वियतनाम युद्ध के दौरान 1967 से 1972 तक अमेरिकी वायुसेना ने ऑपरेशन पोपाई नामक एक गुप्त अभियान चलाया, जिसका लक्ष्य वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के कुछ इलाकों में आकाश में सिल्वर आइओडाइड जैसे रसायन छिड़ककर बादलों को अधिक और लंबे समय तक बरसाने पर मजबूर करना था। इसका लक्ष्य यह था कि ज़मीन की सड़कें इतनी धंस जाएँ, नदियाँ छलक जाएँ कि दुश्मन की आपूर्ति‑पटरियाँ बंद हो जाएँ; इस तरह युद्ध में सामान्य युद्ध‑कौशल के साथ एक अदृश्य “प्राकृतिक अस्त्र” भी खेला जाए। इस अभियान का अमेरिकी कांग्रेस के दबाव और जन‑आक्रोश के बाद खुलासा हुआ और इसे आधिकारिक तौर पर बंद भी किया गया; आज इसे डिक्लासिफाइड फाइल्स के रूप में देखा जा सकता है। यानी यह दावा कि “मानव ने जलवायु को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की है”, पूरी तरह काल्पनिक तो नहीं है।

इसी समयावधि के दौरान अमेरिका ने प्रोजेक्ट स्टॉर्मफ्योरी  जैसे अन्य प्रयोग भी चलाए, जिनमें हरिकेन या शक्तिशाली तूफानों की आकृति और तीव्रता को कमज़ोर करने की तकनीकी कोशिशें की गईं। इसका उद्देश्य यह था कि तूफानों के मार्ग या उनकी झुकाव‑रेखा बदलकर उनकी विनाशकारी ताकत घटाई जा सके, पर वैज्ञानिक रूप से इन प्रयासों का परिणाम बहुत हद तक अस्पष्ट रहा तो  इस प्रयोग को अंततः बंद भी कर दिया गया।

यह साफ़ दिखाता है कि वैज्ञानिक और सैन्य दोनों ही दिशाओं में मानव‑निर्मित जलवायु‑हस्तक्षेप की सीमा आज भी बहुत सीमित और अनिश्चित है।

ऐसे इतिहास को देखकर यह कहना गलत नहीं कि जलवायु‑तकनीकें राजनीतिक‑सामरिक उद्देश्यों के लिए एक बार इस्तेमाल की गई हैं, लेकिन यह कदम‑कदम बढ़कर  “जो भी मौसम को नियंत्रित करता है, वह दुनिया को नियंत्रित करता है” जैसे नारे के स्तर पर उठ जाना, वैज्ञानिक तथ्यों से अधिक भय‑और‑राजनीती की तरफ़ इशारा करता है।

वैसे भी दुनिया के कुछ देशों में नियमित रूप से क्लाउड‑सीडिंग जैसी तकनीकें चलती हैं, जिनमें सिल्वर आइओडाइड या अन्य पदार्थों को बादलों में छोड़कर बारिश या बर्फ़बारी की मात्रा में थोड़ी सी वृद्धि करने की कोशिश की जाती है; यह ज़्यादातर कृषि, जल‑संरक्षण या शहरों की धूल घटाने जैसे उद्देश्यों से चलता है। लेकिन यह प्रक्रिया इतनी हल्की और स्थानीय होती है कि इससे न तो पूरी नदी‑घाटी का पानी रोका जा सकता है, न ही किसी जल‑संकट का समाधान किया जा सकता है।

इस बीच हाल के दिनों में ईरान पर भी ऐसी ही एक तरह की चर्चा शुरू हो गई है। ईरान लंबे समय से गहरे जल संकट से जूझ रहा है, नदियों पर बने बांध, भूमिगत जल का अतिक्रमण, जल‑निकासी की खराब व्यवस्था, और जल‑संरक्षण की अनदेखी ने उसे एक ऐसी स्थिति में धकेला है जहाँ नदियाँ सूखी, झीलें उबड़‑खाबड़ और जलाशय लगभग खाली रहते थे। फिर अचानक 2026 के शुरूआती महीनों में ईरान में भारी बारिश और बर्फबारी हुई, जिससे डैम भरने लगे, शुष्क झीलों में फिर से पानी दिखने लगा और कुछ जगहों पर तो बाढ़ जैसी स्थिति भी बन गई। ठीक इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक व्यापक दावा फैलाया गया कि यह बारिश अचानक इसलिए आई कि युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव के बाद “अमेरिका‑इज़राइल‑यूएई के वेदर‑हथियार” बंद हो गए हैं, वरना ये तीनों देश मिलकर बादलों को ईरान से पहले ही बरसा देते थे और ईरान को सूखे में डाल रखते थे। इस दावे ने एक बार फिर से बहस को नयी दिशा दे दी है ।

बीते कुछ सालों में युद्ध की रणनीतियां तेजी से बदली हैं. अब यह पारंपरिक शैली का न हो कर आर्थिक और तकनीकी आधारित हो चुका है । जिन बातो और घटनाओं को हम फिक्शन किताबो या सिनेमा में देखते थे, वे सब अब वास्तविकता का हिस्सा हैं ।

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