क्या भारत अपनी पुरानी विदेश नीति पर लौटेगा ?


डा. उत्कर्ष सिन्हा
भारतीय विदेश नीति हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता की मिसाल रही है। नेहरू काल की गुट निरपेक्ष नीति से लेकर आज के मल्टी-अलाइनमेंट तक,भारत कभी किसी एक शक्ति के इशारे पर नहीं चला था । लेकिन पिछले कुछ वर्षों में,खासकर मोदी सरकार के दूसरे और तीसरे कार्यकाल में, नीति में एक स्पष्ट झुकाव दिखा—अमेरिका और इजराइल की ओर। अब 2026 में, जब अमेरिकी दबाव बढ़ा, इजराइल के साथ नजदीकी चरम पर पहुंची और पड़ोसी देशों में खिंचाव हुआ, तो सरकार रूस, ईरान और दक्षिण एशिया के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रही है। क्या यह पुरानी नीति की ओर वापसी है, या बस बदलते वैश्विक परिदृश्य में व्यावहारिक समायोजन?
पिछले वर्षों में भारत-अमेरिका और भारत-इजराइल संबंधों में अभूतपूर्व गति आई। क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति और रक्षा-प्रौद्योगिकी साझेदारी ने वाशिंगटन को करीबी साझेदार बना दिया। इजराइल के साथ तो संबंध इतने गहरे हो गए कि अक्टूबर 2023 के बाद गाजा संकट पर भारत ने सार्वजनिक रूप से चुप्पी साध ली। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी का इजराइल दौरा और वहां कनेसेट में दिए गए बयान—“भारत इजराइल के साथ पूरी दृढ़ता से खड़ा है”—ने इस झुकाव को चरम पर पहुंचा दिया। फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत का ऐतिहासिक समर्थन लगभग गायब हो गया।
इसके ख़राब नतीजे भी दिखे। दक्षिण एशिया में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को झटका लगा। बांग्लादेश में 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद अंतरिम सरकार के साथ संबंध बहुत ज्यादा बिगड़े। नेपाल की जनता में भारत के प्रति बढ़ते गुस्से के साथ ही नेपाल में 2025 के ‘जेन जेड’ विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता ने सीमा, व्यापार और जल संसाधनों पर तनाव बढ़ाया। अमेरिका की ओर से रूसी तेल खरीद को लेकर 2025-26 में 25-50 प्रतिशत तक के टैरिफ लगाए गए, जिससे भारत को मजबूरन रूसी कच्चे तेल के आयात में भारी कटौती करनी पड़ी (2025 के 33 प्रतिशत से फरवरी 2026 तक 21 प्रतिशत तक)।
अब 2026 हुए ईरान-अमेरिका-इजराईल युद्ध के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख कुछ बदलता नजर आ रहा है। हालिया संकट के बाद रूस के साथ संपर्क फिर तेज हुआ है। दिसंबर 2025 में पुतिन की भारत यात्रा और मार्च 2026 में दोनों देशों के बीच ‘नई द्विपक्षीय एजेंडा’ पर चर्चा ने रक्षा, व्यापार और ऊर्जा सहयोग को नई गति दी। ईरान के प्रति रुख भी सकारात्मक है—चाबहार बंदरगाह पर निवेश जारी है, हालांकि ईरान-इजराइल युद्ध (फरवरी 2026) में भारत ने आधिकारिक तौर पर तटस्थता बरती, लेकिन ईरानी जहाज को कोच्चि में शरण दी और ईरानी राष्ट्रपति से फोन पर बात की।
पड़ोस में भी सुधार के संकेत साफ मिल रहे हैं। बांग्लादेश में फरवरी 2026 के चुनावों के बाद नई सरकार (बीएनपी या गठबंधन) के साथ संबंध सुधारने की कोशिशें तेज हो गई हैं—वीजा सेवाएं बहाल हुयी, विकास परियोजनाएं फिर शुरू हो रही है, और व्यापार-कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है । नेपाल में मार्च 2026 में नए प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के साथ हाइड्रोपावर, कनेक्टिविटी और निवेश पर सहयोग बढ़ाने की बात हो रही है।
क्या यह पुरानी नीति—यानी रूस-ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध, फिलिस्तीन समर्थन और पड़ोसी प्राथमिकता—की ओर वापसी है? आंशिक रूप से हां। लेकिन पूरी तरह नहीं। यह दरअसल ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की मजबूरी है। अमेरिकी दबाव (ट्रंप प्रशासन के टैरिफ और ईरान युद्ध) ने भारत को याद दिलाया कि एक तरफा झुकाव खतरनाक हो सकता है। रूसी तेल पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है। ईरान चाबहार के जरिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच देता है। बांग्लादेश-नेपाल स्थिरता के बिना भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा अधूरी है।
फिर भी, चुनौतियां कम नहीं। अमेरिका के साथ रक्षा-प्रौद्योगिकी साझेदारी अभी भी मजबूत है। इजराइल के साथ खुफिया और ड्रोन सहयोग जारी है। ईरान युद्ध में भारत का ‘तटस्थ लेकिन इजराइल के प्रति झुके हुए रुख ने कुछ आलोचनाएं भी बटोरीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रख पाएगा, या अमेरिकी दबाव और आर्थिक जरूरतों के सामने झुक जाएगा?
भारत की विदेश नीति आज ‘व्यवहारवाद’ (pragmatism) की तरफ जाने के साथ ही पुराने सिद्धांतो पर टिके रहने की होनी चाहिए । कुछ हद तक पुरानी गुट निरपेक्षता की सख्ती, न कि नई ‘एक तरफा गठबंधन’ की मजबूरी। यह बदलते विश्व व्यवस्था—ट्रंप 2.0, ईरान संकट, दक्षिण एशिया की राजनीतिक हलचल—में राष्ट्रीय हितों की रक्षा का समय है। अगर यह रास्ता मजबूत हुआ,तो भारत न सिर्फ अपनी पुरानी विरासत को संभालेगा, बल्कि नई दुनिया में एक विश्वसनीय ‘बैलेंसिंग पावर’ के रूप में उभरेगा।
समय बताएगा कि यह सुधार स्थायी है या सिर्फ अस्थायी समायोजन। सच्ची विदेश नीति वही है जो हितों की रक्षा करे, बिना किसी की गुलामी स्वीकारे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरष्ट्रीय संबंधो पर टिप्पणीकार हैं)


