डमी स्कूल और कोचिंग का घातक गठजोड़: भारतीय शिक्षा प्रणाली का गहराता ‘प्रदूषण’

भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां ज्ञानार्जन का मार्ग धुंधला होता जा रहा है और ‘सफलता’ का एक कृत्रिम बाजार फल-फूल रहा है। हाल ही में समाचार पत्रों में उजागर हुई “डमी स्कूल” और कोचिंग संस्थानों के बीच की साठगांठ ने उस कड़वी सच्चाई को फिर से सतह पर ला दिया है ! राजस्थान की राजधानी जयपुर से लेकर देश के अन्य शैक्षणिक केंद्रों तक, “डमी मॉडल” एक ऐसी संक्रामक बीमारी की तरह फैल चुका है जो हमारी औपचारिक स्कूली शिक्षा की नींव को खोखला कर रहा है।

“डमी स्कूल” का सीधा अर्थ है—एक ऐसा विद्यालय जहां छात्र का नामांकन तो है, लेकिन उसकी उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। छात्र अपना पूरा समय निजी कोचिंग संस्थानों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बिताता है, जबकि स्कूल प्रबंधन भारी भरकम फीस लेकर कागजों पर उसकी 75 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कर देता है। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि एक व्यापक संस्थागत भ्रष्टाचार है।

इस गठजोड़ में तीन मुख्य खिलाड़ी हैं: कोचिंग माफिया, स्कूल प्रबंधन और नौकरशाही। कोचिंग संस्थान छात्रों को ‘पैकेज’ बेचते हैं जिसमें स्कूल का डमी एडमिशन भी शामिल होता है। स्कूल बिना पढ़ाए मोटी रकम कमाते हैं और शिक्षा विभाग के अधिकारी अपनी ‘मौन सहमति’ से इस अवैध कारोबार को संरक्षण देते हैं। यह विडंबना ही है कि जहां स्कूलों की कक्षाएं खाली पड़ी हैं, वहीं कोचिंग संस्थान खचाखच भरे हैं।

शिक्षा कभी एक पवित्र ‘संस्कार’ और ‘साधना’ थी, लेकिन आज यह पूरी तरह से ‘कमोडिटी’ (वस्तु) बन चुकी है। जब हम शिक्षा के बाजारीकरण की बात करते हैं, तो हम उस नैतिक पतन की ओर इशारा करते हैं जिसे मैं “‘एजुकेशन पॉल्यूशन – शिक्षा प्रदूषण ” कहता हूँ । यह प्रदूषण केवल पर्यावरण में नहीं, बल्कि हमारी सोच और व्यवस्था में भी घर कर गया है।

एक प्राणि विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी जीव के सर्वांगीण विकास के लिए उसका प्राकृतिक परिवेश अनिवार्य होता है। छात्र के लिए ‘स्कूल’ वह प्राकृतिक परिवेश है जहां वह केवल विषय नहीं सीखता, बल्कि सामाजिक संवाद, खेल, अनुशासन और नैतिक मूल्य भी सीखता है। डमी मॉडल उसे इस परिवेश से काटकर एक कृत्रिम ‘प्रेशर कुकर’ (कोचिंग) में डाल देता है। परिणाम स्वरूप, हमें ‘रैंक होल्डर्स’ तो मिल रहे हैं, लेकिन ‘संवेदनशील और जागरूक नागरिक’ खो रहे हैं।

आज तक की लगभग सभी सरकारी योजनाएं और नियम इस डमी कल्चर को रोकने में विफल रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारी नीतियां केवल ‘सतही लक्षणों’ का इलाज करती हैं, ‘मूल बीमारी’ का नहीं। बायोमेट्रिक उपस्थिति या औचक निरीक्षण जैसे उपाय केवल कागजी साबित हुए हैं क्योंकि निरीक्षण करने वाले हाथ भी उसी भ्रष्टाचार की गंगा में धुले हुए हैं। राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही अक्सर इन संस्थानों के रसूख और चंदे के आगे नतमस्तक रहते हैं। जब तक शिक्षा का उद्देश्य केवल ‘वोट बैंक’ और ‘आंकड़ों का खेल’ रहेगा, तब तक वास्तविक सुधार की उम्मीद बेमानी है।

इस समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान प्रवेश परीक्षा प्रणाली को जड़ से बदलना है। वर्तमान में, 12वीं की बोर्ड परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच का ‘गैप’ ही कोचिंग और डमी स्कूलों की जननी है। जब तक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान  और मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का आधार केवल एक दिन की ‘3 घंटे की परीक्षा’ रहेगी, तब तक छात्र स्कूल जाने को समय की बर्बादी मानते रहेंगे।

हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहां  निरंतर मूल्यांकन होना चाहिए ! छात्र के 11वीं और 12वीं के शैक्षणिक रिकॉर्ड को प्रवेश का मुख्य आधार बनाया जाए। बोर्ड और एंट्रेंस का एकीकरण होना चाहिए ! स्कूल के पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर में जो भारी अंतर है, उसे खत्म किया जाए।  रटने की क्षमता के बजाय छात्र की स्वाभाविक योग्यता और रुचि  का परीक्षण होना चाहिए।

नौकरशाही और राजनीतिक हस्तक्षेप से ऊपर उठकर अब समय आ गया है कि एक संवैधानिक रूप से स्वतंत्र ‘भारतीय शिक्षा नियामक’  का गठन किया जाए। यह नियामक चुनाव आयोग या सीएजी की तरह स्वायत्त होना चाहिए।

इस नियामक के पास सख्त ऑडिटिंग , स्कूलों की भौतिक उपस्थिति और आधार-लिंक्ड बायोमेट्रिक डेटा का सीधा नियंत्रण, डमी नामांकन पाए जाने पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्कूल की मान्यता और कोचिंग के पंजीकरण को तुरंत रद्द करने का अधिकार। । कोचिंग संस्थानों द्वारा किए जाने वाले भ्रामक विज्ञापनों और अनियंत्रित फीस वसूली पर कानूनी लगाम लगाना।: शिक्षा क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक स्वतंत्र विजिलेंस विंग के लिए शक्तियां होनी चाहिए ।

डमी मॉडल का सबसे भयावह पहलू छात्रों का गिरता मानसिक स्वास्थ्य है। स्कूल और कोचिंग के बीच संतुलन न बन पाने से छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है, जो अंततः उन्हें आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदमों की ओर धकेलता है। एक छात्र जो स्कूल नहीं जाता, वह एकाकीपन का शिकार हो जाता है। वह केवल फॉर्मूले और शॉर्टकट्स के बीच फंस कर रह जाता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस ‘एजुकेशन पॉल्यूशन’ से नहीं बचा पाए, तो हम केवल डिग्रियां बांटने वाला कारखाना बनकर रह जाएंगे। डमी स्कूलों और कोचिंग माफिया का यह गठजोड़ राष्ट्र के बौद्धिक भविष्य के लिए एक ‘कैंसर’ है।

इसके लिए केवल कड़े कानून पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि एक प्रशासनिक इच्छाशक्ति  और संवैधानिक स्वायत्तता वाले नियामक की आवश्यकता है। साथ ही, अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि उनके बच्चे की ‘रैंक’ उसके ‘व्यक्तित्व’ से बड़ी नहीं है।

समय आ गया है कि हम “शिक्षा बचाओ” को एक जन-आंदोलन का रूप दें, ताकि हमारा शिक्षा तंत्र फिर से ज्ञान, चरित्र और मानवता का प्रकाश फैला सके। जैसा कि मैंने हमेशा माना है—जब तक जड़ें मजबूत नहीं होंगी, तब तक ज्ञान का वृक्ष फलदायी नहीं हो सकता। डमी मॉडल उन जड़ों को काट रहा है, जिसे रोकना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और पूर्व कुलपति कानपुर और गोरखपुर विश्वविद्यालय हैं)

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