असम चुनाव में क्या फंस गई है BJP ?

असम विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले भाजपा में आंतरिक बगावत तेज हो गई है, जो पार्टी की स्थिति को फंसती हुई दिखा रही है। टिकट वितरण को लेकर पुराने नेताओं में भारी असंतोष व्याप्त है, जिससे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (हेमंत विश्वशर्मा) की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों में मतभेद है कि क्या यह बगावत भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाएगी या सरमा की मनौव्वल क्षमता इसे काबू में रख लेगी।

बगावत के कारण और हिमंता की रणनीति

भाजपा में बगावत का मुख्य कारण टिकट न मिलने की शिकायत है। लगभग 19 पूर्व विधायकों समेत कई वरिष्ठ नेता जैसे अतुल बोरा, निहार रंजन दास, अमिया कुमार भूयान, नंदिता गार्लोसा, चक्रधर दास, जयंता कुमार दास और रामेंद्र नारायण कलिता ने नाराजगी जताई या पार्टी छोड़ दी। इनकी मुख्य शिकायत है कि कांग्रेस से आए नेताओं जैसे प्रद्युत बोर्डोलोई और भूपेन बोराह को प्राथमिकता दी गई, जबकि 1985 से वफादार पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई।

दिसपुर में जयंता दास ने 35 वर्ष की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया और निर्दलीय लड़ने की घोषणा की। उन्होंने भाजपा को “कांग्रेस भाजपा” करार दिया। इसी तरह गुवाहाटी सेंट्रल और अन्य क्षेत्रों में विद्रोह दिखा। बराक घाटी और पहाड़ी जिलों में बूथ मैनेजमेंट प्रभावित होने की आशंका है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने बागियों को मनाने के लिए सक्रिय कदम उठाए। उन्होंने और प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने असंतुष्ट नेताओं से मुलाकात की, फोन पर बात की और पदों या भविष्य के अवसरों का आश्वासन दिया। अतुल बोरा से व्यक्तिगत मुलाकात के बाद विद्रोह थम गया और बोरा ने 2029 लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। सरमा ने “ताजा खून” और परिसीमन के प्रभाव का हवाला देकर फैसले को न्यायोचित ठहराया, साथ ही कहा कि 1400 से अधिक आकांक्षियों में से सभी को टिकट नहीं मिल सकता।

विशेषज्ञों में मतभेद है—कुछ का मानना है कि सरमा की यह रणनीति सफल रही और पार्टी एकजुट दिख रही है, जबकि अन्य चेतावनी दे रहे हैं कि वोट बंटवारा अभी भी भाजपा की सीटों पर असर डाल सकता है।

सबसे ज्यादा बगावत वाली सीटें

बगावत सबसे ज्यादा दिसपुर, बिहपुरिया, सोनारी, गुवाहाटी सेंट्रल और बराक घाटी की कुछ सीटों पर दिख रही है। दिसपुर में त्रिकोणीय मुकाबला संभावित है, जहां जयंता दास निर्दलीय उतर सकते हैं। इन क्षेत्रों में पुराने नेताओं की नाराजगी से संगठनात्मक एकजुटता प्रभावित हो रही है।

कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस ने 2026 चुनाव के लिए राज्यव्यापी पुनर्गठन किया है। पार्टी गौरव गोगोई के नेतृत्व में बिना स्पष्ट सीएम चेहरे के चुनाव लड़ रही है, लेकिन तरुण गोगोई की विरासत और “तीन गोगोई” (गौरव, अखिल, लुरिनज्योति) का सहारा ले रही है। कांग्रेस ने 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है और पांच अन्य दलों के साथ गठबंधन किया है, जिसमें कुछ सीटें त्यागने को भी तैयार है ताकि भाजपा विरोधी वोट बंटे नहीं।

पार्टी ने हिमंत सरमा के विवादों—परिवार पर 3,900 एकड़ से अधिक भूमि हड़पने के आरोप, नफरत भरे बयानों (मुस्लिमों पर पॉइंट ब्लैंक गोली वाले AI वीडियो आदि)—को प्रमुख मुद्दा बनाया है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कुछ बयानों को विभाजनकारी करार दिया था। कांग्रेस ने राज्यव्यापी प्रदर्शन किए और भाजपा की बगावत का फायदा उठाने की योजना बनाई है। “समय परिवर्तन यात्रा” जैसी पहल से जनसंपर्क बढ़ाने की कोशिश है।

निर्दलीय उम्मीदवारों का असर

निर्दलीय उम्मीदवारों का असर महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां भाजपा के विद्रोही मजबूत हैं। अगर बागी वोट काटते हैं तो भाजपा की कई सीटें कांग्रेस या गठबंधन को जा सकती हैं। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि निर्दलीय ज्यादा असर नहीं डालेंगे क्योंकि असम की सियासत अभी भी दो ध्रुवीय बनी हुई है। कुल 126 सीटों में वोट बंटवारा भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है, लेकिन हिमंत सरमा विकास, शांति और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस कर पार्टी को मजबूत रखने की कोशिश कर रहे हैं।

असम के अखबारों की राय

असम के प्रमुख अखबार इस मुद्दे को प्रमुखता दे रहे हैं। असम ट्रिब्यून ने टिकट विवाद से उत्पन्न असंतोष को हाइलाइट किया और रिपोर्ट किया कि दिसपुर में जयंता दास तथा गुवाहाटी सेंट्रल में रामेंद्र नारायण कलिता जैसे नेताओं को टिकट न मिलने से विद्रोह तेज हुआ। अखबार ने लिखा कि सरमा और सैकिया असंतुष्टों को शांत करने में जुटे हैं, लेकिन कांग्रेस से आए नेताओं को प्राथमिकता दिए जाने से पुराने कार्यकर्ता नाराज हैं।

अन्य स्थानीय कवरेज में बराक घाटी व पहाड़ी क्षेत्रों में बूथ मैनेजमेंट पर असर बताया जा रहा है । कुल मिलाकर, असम के अखबार भाजपा को गंभीर चुनौती बता रहे हैं, हालांकि वे सरमा की मनौव्वल कोशिशों पर भी रिपोर्ट कर रहे हैं।

फ़िलहाल तो असम चुनाव में भाजपा की फंसती स्थिति साफ दिख रही है। हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीति बागियों को कुछ हद तक संभाल रही है, लेकिन कांग्रेस की एकजुटता और निर्दलीयों का वोट बंटवारा मुकाबला कड़ा बना सकता है। 9 अप्रैल 2026 को होने वाले मतदान से पहले अनिश्चितता बनी हुई है।

असम की सियासत में यह चुनाव विकास बनाम विवाद और एकजुटता बनाम बगावत की परीक्षा साबित होगा।

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