युद्ध के बीच अब दुनिया के सामने आने लगा है फिलीस्तीन का दर्द

सम्पादकीय

डा. उत्कर्ष सिन्हा
लंबे समय तक इजरायल और अमेरिका की मिली-जुली रणनीति ने फिलिस्तीन मुद्दे को वैश्विक पटल से दबाकर रखा था। दशकों तक इसे ‘क्षेत्रीय विवाद’ का नाम देकर, मीडिया में सीमित कवरेज देकर और कूटनीतिक दबाव बनाकर दुनिया की नजरों से ओझल कर दिया गया था।
लेकिन अप्रैल 2024 के ईरान-इजरायल युद्ध ने सब कुछ बदल दिया। क्षेत्रीय तनाव के बीच अब गाजा और वेस्ट बैंक में इजरायली हमलों ने नरसंहार का रूप ले लिया है। अब यूरोपीय देशो के प्रधानमंत्री, फ्रांस के राष्ट्रपति, संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारी और विश्व के प्रमुख पत्रकार खुलकर कह रहे हैं – यह सिर्फ युद्ध नहीं, फिलीस्तीन के सुनियोजित विनाश की साजिश है। 45,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत, जिनमें बहुसंख्यक महिलाएं और बच्चे, अब कोई ‘आंकड़ा’ नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध का प्रमाण बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम रिपोर्ट्स स्पष्ट बता रही है कि अक्टूबर 2023 से अब तक गाजा में इजरायली कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को मलबे के ढेर में बदल दिया है। अस्पताल ध्वस्त, स्कूल तबाह, खेती-किसानी नष्ट होने के साथ दो मिलियन से अधिक फिलिस्तीनी भुखमरी के कगार पर खड़े हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट में साफ कहा, “गाजा में इजरायली कार्रवाई नरसंहार के सभी लक्षण दिखा रही है। ईरान के साथ तनाव ने इसे और भयावह बना दिया है।” उनके शब्दों में यह कोई संयोग नहीं, बल्कि ‘सुनियोजित विनाश’ है। यूएन के विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बनेज ने नवंबर 2025 में चेतावनी दी थी, “दो मिलियन फिलिस्तीनी भुखमरी के कगार पर हैं – यह आबादी को मजबूरन खाली कराने की नीति है।”
यूरोपीय नेताओं की आवाज ने इस दर्द को और तीखा कर दिया है। आयरलैंड के प्रधानमंत्री साइमन हैरिस ने मार्च 2026 में डबलिन से कहा, “इजरायल के गाजा अभियान को अब नरसंहार कहना जरूरी है। यूरोप चुप नहीं रहेगा।” स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने फरवरी 2026 में यूरोपीय संसद में खड़े होकर चेतावनी दी, “ईरान युद्ध के बहाने फिलिस्तीन पर अत्याचार जारी हैं। हम मानवाधिकारों की रक्षा करेंगे – चाहे जितना दबाव पड़े।” फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने जनवरी 2026 में पेरिस से घोषणा की, “गाजा में भुखमरी और बमबारी युद्ध अपराध हैं। अंतरराष्ट्रीय अदालत को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।”
ये बयान महज शब्द नहीं, बल्कि यूरोप की नीति में बदलाव का संकेत हैं। दशकों तक अमेरिका के साथ खड़े रहने वाले यूरोपीय देश अब स्वतंत्र रूप से फिलिस्तीनी पीड़ा को स्वीकार कर रहे हैं।
पत्रकारिता की आंखों ने भी इस सच्चाई को बेनकाब किया है। अमेरिकी पत्रकार एमी गुडमैन ने अपने कार्यक्रम में कहा, “इजरायल ने गाजा को ‘नरसंहार का मैदान’ बना दिया है।” बीबीसी की लिन्डसे हेंस ने इसे “जातीय सफाई” करार दिया। अल जजीरा की नेहा अल-हुसैनी ने दुनिया के सामने दोहरे मापदंड को रेखांकित किया – जहां एक तरफ यूक्रेन के लिए तुरंत मदद और निंदा, वहीं फिलिस्तीन पर चुप्पी?
विश्व के राजनीतिज्ञ भी अब चुप नहीं हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तईप एर्दोगन ने इसे “21वीं सदी
का होलोकॉस्ट” कह दिया तो दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने इसे स्पष्ट युद्ध अपराध घोषित किया। भारत में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद और सोशल मीडिया पर इसे “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया। एमनेस्टी इंटरनेशनल की ब्रीजेट एंड्रयूज ने “आबादी रहित क्षेत्र” बनाने की इजरायली नीति की कड़ी आलोचना की। ये आवाजें एशिया, अफ्रीका और यूरोप से आ रही हैं – साबित कर रही हैं कि फिलिस्तीन अब कोई ‘स्थानीय मुद्दा’ नहीं रहा।
ईरान-इजरायल युद्ध ने इस पूरे संकट को नया आयाम दिया। ईरान का अप्रैल 2024 का हमला और इजरायल की जवाबी कार्रवाई ने मध्य पूर्व को आग के चंगुल में झोंक दिया। लेकिन इस युद्ध के बीच भी गाजा और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों पर हमले रुके नहीं। बल्कि बढ़ गए। इजरायल ने इसे “आत्मरक्षा” का नाम दिया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय नेता इसे “अत्याचार का बहाना” बता रहे हैं।
बदले हालत में ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रहेगा । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर का दुरुपयोग, आईसीजे के फैसलों की अनदेखी और मानवीय सहायता को रोकने की कोशिशें अब अस्वीकार्य हैं। फिलिस्तीन मुद्दा अब मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता का सवाल बन चुका है। अगर विश्व इस नरसंहार को रोक नहीं पाया तो कल कोई और क्षेत्र इसी आग में जल सकता है।
भारत के लिए यह क्षण परीक्षा का है। भारत हमेशा से फिलिस्तीन का समर्थन करता आया है। लेकिन आज जब यूरोप की आवाजें गूंज रही हैं, तो भारत यूरोप की तरह क्यों खुलकर नहीं बोल पा रहा यह भी चिन्ता का विषय है । क्या हम मानवता के पक्ष में मजबूत रुख अपनाएंगे या फिर सामान दक्षिणपंथी विचार के कारण इजराईल के साथ ही खड़े दिखेंगे ? प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को भी अब स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए – नरसंहार की निंदा, तत्काल युद्धविराम की मांग और फिलिस्तीनियों को न्याय दिलाने में सक्रिय भूमिका।
फिलिस्तीन का दर्द अब दब नहीं सकता। गाजा की गलियों में रोते बच्चे, वेस्ट बैंक के खंडहर और लाखों बेघर परिवारों की कहानी अब पूरी दुनिया सुन रही है। इतिहास गवाह है – दबाया गया सच आखिरकार फूट ही निकलता है। अब समय है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय न सिर्फ शब्दों में, बल्कि कार्रवाई में भी फिलिस्तीन के साथ खड़ा हो। दो-राज्य समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, मानवीय सहायता बिना रुकावट पहुंचे और दोषियों को न्याय के कठघरे में खड़ा किया जाए।
यह सिर्फ फिलिस्तीन का मुद्दा नहीं – यह पूरे मानव सभ्यता का सवाल है।



