अमेरिका–इज़राइल–ईरान संघर्ष से बढ़ रहा दुनिया में तनाव

डॉ. दिनेश चंद्र श्रीवास्तव
28 फ़रवरी 2026 को इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष, जो 7 अक्टूबर 2023 से शुरू हुआ था, एक नए और अत्यंत खतरनाक चरण में प्रवेश कर गया। संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर समन्वित हवाई हमले किए, जिनमें उसके सैन्य ठिकानों, परमाणु सुविधाओं और विशेष रूप से शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु हो गई।
इसके तुरंत बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इज़राइल और खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। कई अमेरिकी ठिकानों को भारी नुकसान हुआ और उन्नत रक्षा प्रणाली (जैसे आयरन डोम) के बावजूद इज़राइल को भी नुकसान झेलना पड़ा। 4 मार्च 2026 को हिज़्बुल्लाह ने भी इस संघर्ष में प्रवेश करते हुए लेबनान से इज़राइल पर रॉकेट हमले किए, जिसके जवाब में इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान में भारी बमबारी की।
संघर्ष जल्द ही पूरे क्षेत्र में फैल गया, जहाँ जॉर्डन, क़तर, कुवैत और इराक में भी हमलों की घटनाएँ सामने आईं। वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़रानी बाधित होने लगी, जो विश्व के लगभग 20% तेल परिवहन का मार्ग है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जहाज़ों, हवाई अड्डों, तेल रिफाइनरियों और जल शोधन संयंत्रों जैसे नागरिक ढाँचे को भी निशाना बनाकर संघर्ष को और तेज कर दिया। अब यह युद्ध चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और दोनों पक्षों की ओर से पूरी ताकत के साथ युद्ध जारी है।
इज़राइल को ईरान के कई वरिष्ठ नेताओं को समाप्त करने में कुछ सफलता मिली है, जो उसके अस्तित्व के विरोधी थे और हमास तथा हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों के माध्यम से उसके खिलाफ गतिविधियाँ संचालित करते थे। इज़राइल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर ले, क्योंकि ऐसा होने पर यह उसके लिए अस्तित्व का गंभीर खतरा बन सकता है। इस दृष्टिकोण से यह युद्ध इज़राइल के लिए अपनी सुरक्षा और अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है।
ऐतिहासिक रूप से, 1979 की इस्लामी क्रांति, जिसका नेतृत्व रुहोल्लाह खुमैनी ने किया था, से पहले ईरान और इज़राइल के बीच कोई विशेष शत्रुता नहीं थी। इसके बाद वैचारिक और राजनीतिक कारणों से दोनों देशों के संबंध खराब होते गए। ऐसा प्रतीत होता है कि ईरान का धार्मिक नेतृत्व आंतरिक वैधता बढ़ाने और इस्लामी दुनिया में नेतृत्व स्थापित करने के लिए इज़राइल के विरोध को एक साधन के रूप में उपयोग करता रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान की आम जनता इस दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत है या नहीं।
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रणनीतिक दृष्टि से, इज़राइल का दीर्घकालिक उद्देश्य ईरान के वर्तमान शक्ति ढाँचे को कमजोर करना, वहाँ एक वास्तविक लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करना (संभवतः अमेरिका की सहायता से) तथा उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करना प्रतीत होता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए यह स्थिति जटिल होती जा रही है। ऐसा लगता है कि वह इस युद्ध में गहराई से उलझ गया है, जबकि उसे ईरान से कोई प्रत्यक्ष अस्तित्वगत खतरा नहीं था। अब उसके लिए सम्मानजनक तरीके से इस युद्ध से बाहर निकलना कठिन होता जा रहा है। यद्यपि उसे कुछ रणनीतिक लाभ जैसे ऊर्जा संसाधनों पर प्रभाव मिल सकते हैं, लेकिन युद्ध की लागत बहुत अधिक है। पेंटागन ने इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त बजट की मांग यू एस काँग्रेस से की है।
इसके अलावा, अमेरिका को खाड़ी क्षेत्र में अपने सैन्य ढाँचे को नुकसान और एक सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी विश्वसनीयता में कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। नाटो के कई देशों ने भी उसके इस कदम का पूर्ण समर्थन नहीं किया है। अमेरिका को ईरान के विरुद्ध वांछित सहायता पाकिस्तान से भी नही मिल रही प्रतीत हो रही है। ऐसी स्थिति में खाड़ी देश अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार कर सकते हैं, जिससे एक नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था उभर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह अमेरिका के वैश्विक प्रभाव के लिए बड़ा झटका होगा।
ईरान के लिए, अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई करना लगभग अनिवार्य था, और उसने पूरी ताकत के साथ प्रतिक्रिया दी है। हालांकि, उसके सैन्य संसाधन सीमित हैं। वह रूस और चीन से सैन्य सहायता की अपेक्षा कर सकता है, लेकिन यूक्रेन युद्ध में व्यस्त होने के कारण रूस की भूमिका सीमित रह सकती है, जिससे चीन प्रमुख सहयोगी बन सकता है।
यदि चीन, ईरान को उन्नत हथियार, जैसे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल, उपलब्ध कराता है, और चीन या पाकिस्तान के सहयोग के माध्यम से उसे परमाणु क्षमता मिलती है, तो यह अमेरिका के लिए अत्यंत गंभीर स्थिति होगी। दूसरी ओर, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ढाँचे पर हमले और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के माध्यम से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की अपनी क्षमता दिखा दी है। यदि युद्ध लंबा चलता है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है, जिसके लिए कई देश अमेरिका और इज़राइल को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। इस दृष्टि से ईरान की रणनीति कुछ हद तक सफल हो सकती है, हालांकि अमेरिका अपने ऊर्जा निर्यातक होने के कारण आंशिक रूप से लाभ भी उठा सकता है।
इस युद्ध की निरंतरता वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और संभावित आर्थिक मंदी का कारण बन सकती है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में है कि इस संघर्ष को शीघ्रातिशीघ्र संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाप्त किया जाए।
(लेखक स्वतंत्र विचारक एवं नत्र्शत्रिया मामलों के विशेषग्य हैं)



