SAIL नियुक्ति मामले पर संदेह: भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस का भ्रम?

विवेक अवस्थी
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के चेयरमैन पद से अमरेंदु प्रकाश के अचानक बाहर होने के बाद इस्पात मंत्रालय के “सुधार अभियान” को लेकर उम्मीद थी, लेकिन अब वही संस्था एक नई विवादास्पद नियुक्ति से घिरी हुई है। टी. एन. नटराजन की SAIL बोर्ड में निदेशक (वाणिज्य) के रूप में नियुक्ति ने न सिर्फ प्रशासनिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि केंद्र सरकार की “ज़ीरो टॉलरेंस” की नीति की वास्तविक तस्वीर पर भी गंभीर सवाल उठा रही है।
SAIL स्कैम का सिलसिला
SAIL से जुड़े एक बड़े घोटाले में आरोप है कि करीब 1.5 लाख टन स्टील कथित “फेब्रिकेटेड प्रोजेक्ट” या गैर‑प्रोजेक्ट कंपनियों को सप्लाई किया गया। इनमें वेंकटेश इंफ्रा प्रोजेक्ट्स जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं, जो आधिकारिक रूप से निर्माण कार्य करने के बजाय सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका निभाती थीं। लोकपाल ने 10 जनवरी 2024 को इन अनियमितताओं को अंकित करते हुए CBI को जांच की दिशा‑निर्देश दिए थे।
इसी पृष्ठभूमि में नटराजन के कार्यकाल में लगभग 1 लाख टन स्टील ऐसी ही कंपनियों को जारी रहने के आरोप लगते हैं, जिसमें लोकपाल के आदेश के बाद भी लगभग 40,000 टन की आपूर्ति जारी रहना विशेष रूप से चिंताजनक बताया जा रहा है।
नियुक्ति और नैतिक संदेह
केंद्र सरकार ने हाल ही में टी. एन. नटराजन को SAIL के निदेशक (वाणिज्य) के रूप में नियुक्त किया है, जिसे कंपनी के बोर्ड ने 19 मार्च 2026 को मंजूरी दे दी। आधिकारिक तर्क यह है कि नटराजन निलंबित नहीं हैं, उनके खिलाफ चार्जशीट भी दायर नहीं हुई और CBI की प्रश्नावली को “कार्रवाई रोकने वाला” दस्तावेज नहीं माना जाता।
हालांकि, एक तरफ आरोप और जांच जारी हैं और दूसरी तरफ एक ऐसे अधिकारी को पदोन्नत करना, जिनके कार्यालय में इतनी बड़ी स्टील‑सप्लाई अनियमितताओं का आरोप है, प्रशासनिक नियमों के अनुरूप हो सकता है, लेकिन नैतिक जवाबदेही के स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
CBI जांच और ड्यू डिलिजेंस पर संदेह
सूत्रों के अनुसार CBI ने मामले की जांच को विस्तृत रूप से बढ़ाते हुए कई अधिकारियों को नोटिस और प्रश्नावलियाँ भेजी हैं, जिसमें नटराजन भी शामिल बताए जाते हैं। इसके साथ ही यह भी दावा है कि जिन कंपनियों को स्टील दिया गया, उनमें कुछ आपस में जुड़े प्रमोटर्स या ट्रेडिंग नेटवर्क के होने की संभावना है, जो SAIL की ड्यू डिलिजेंस और आंतरिक निगरानी की कमजोरी को उजागर करता है।
ज़ीरो टॉलरेंस की वास्तविक परख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार‑बार भ्रष्टाचार के खिलाफ “ज़ीरो टॉलरेंस” की बात करते रहे हैं। लेकिन SAIL जैसे मामले में देखने पर यह तस्वीर उलट दिखती है—जब आरोप मौजूद हैं, जांच चल रही है और सार्वजनिक संपत्ति पर खतरा साफ है, तो फिर भी नियुक्ति और पदोन्नति जारी रहना उस नीति की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में सिस्टम ने प्रशासनिक सुविधा को नैतिक जिम्मेदारी से ऊपर रख दिया है, जिससे यह संदेश जाता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ “ज़ीरो टॉलरेंस” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी लागू होना चाहिए—विशेष रूप से तब, जब संदेह इतने गंभीर हों कि सावधानी बरतना जरूरी हो।
अगला कदम क्या?
अभी तक नटराजन ने उन आरोपों और सवालों के बारे में खुलकर जवाब नहीं दिया है, जिससे खामोशी को असहजता या संरक्षण की धारणा को बढ़ावा मिलता है। अब असली परख इरादों की है—क्या सरकार और मंत्रालय आसान रास्ता चुनेंगे, या वे उन कठिन फैसलों को भी लेने की हिम्मत दिखाएंगे जो साफ संदेश दें कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस महज आंकड़ों और नियमों का नहीं, बल्कि नैतिक संदेशों का भी दावा है
(विवेक अवस्थी वरिष्ठ पत्रकार और indianpsu.com के संपादक हैं. यह लेख जुबिली पोस्ट और indianpsu.com के बीच खबरों की साझीदारी समझौते के अंतर्गत प्रकाशित है)



