ईरान युद्ध: वैश्विक ऊर्जा संकट की बढ़ती आहट

संपादकीय टिप्पणी

डा. उत्कर्ष सिन्हा

मार्च 2026 के मध्य में अब युद्ध  ऊर्जा क्षेत्रों तक फैल चुका है। ईरान के सबसे बड़े गैस क्षेत्र साउथ पार्स पर इजराइल के हमले के बाद ईरान ने कतर, सऊदी अरब और यूएई के ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, हॉर्मुज जलडमरूमध्य व्यावहारिक रूप से बंद है और दुनिया ऊर्जा संकट की कगार पर खड़ी है।

सबके मन में प्रश् है ? युद्ध किस तरफ जा रहा है? गैस क्षेत्रों पर हमलों के बाद क्या सऊदी अरब अब ईरान पर प्रत्यक्ष हमले की तैयारी कर रहा है?  डोनाल्ड ट्रंप इजराइल को छोड़ने वाले हैं? और वैश्विक ऊर्जा संकट की संभावनाएं वास्तव में कितनी बढ़ गई हैं?  

युद्ध की दिशा: हवाई वर्चस्व से क्षेत्रीय विस्तार की ओर

युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका-इजराइल गठजोड़ ने ईरान के सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। तो वहीँ इरान ने अरब देशो में अमेरिकी अड्डो सहित इजराईल को तबाह कर दिया है । 17-18 मार्च को इजराइल ने सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के पूर्व प्रमुख अली लारीजानी, बसीज कमांडर घोलामरेजा सोलेमानी और इंटेलिजेंस मिनिस्टर एस्माइल खतीब को मार गिराया। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हमलों में 1444 से अधिक मौतें और 19,000 घायल हुए हैं।

ईरान की प्रतिक्रिया उम्मीद से परे रही है। उसने इजराइल पर नौ मिसाइल बैराज दागे, जिनमें क्लस्टर मुनिशन शामिल थे। रामत गान में दो इजराइली नागरिक मारे गए। ईरान ने सीजिल बैलिस्टिक मिसाइल का पहली बार इस्तेमाल किया।

अब युद्ध ऊर्जा क्षेत्र में घुस चुका है। 18 मार्च को इजराइल (अमेरिकी समन्वय के साथ) ने साउथ पार्स/नॉर्थ डोम गैस फील्ड पर हमला किया – दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र, जो ईरान और कतर साझा करते हैं। ईरानी राज्य मीडिया के अनुसार, गैस टैंकों और रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा। ईरान ने इसे ‘बर्बर हमला’ बताया और बदला लेने की कसम खाई।

इसके जवाब में ईरान ने कतर के रास लाफान (दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी प्लांट), मेसाइड पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, सऊदी अरब के रियाद के पास दो रिफाइनरियां, जुबैल पेट्रोकेमिकल और अबू धाबी के अल होस्न गैस फील्ड पर मिसाइल-ड्रोन हमले किए। सऊदी अरब ने चार बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक लिया, लेकिन मलबे से घायल हुए। कतर ने ‘व्यापक क्षति’ की पुष्टि की। ईरान ने इन सुविधाओं को ‘वैध लक्ष्य’ घोषित कर दिया और निकासी का आदेश दिया।

युद्ध की दिशा स्पष्ट है – हवाई वर्चस्व से ऊर्जा युद्ध की ओर। अमेरिका-इजराइल ईरान की मिसाइल और नौसेना क्षमता को कुचलने पर जोर दे रहे हैं, जबकि ईरान प्रॉक्सी और ऊर्जा प्रतिष्ठानों के जरिए क्षेत्रीय सहयोगियों को घसीट रहा है। अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद रहा (जो वर्तमान में व्यावहारिक रूप से बंद है), तो युद्ध लंबा खिंच सकता है। ईरान का शासन टूटने के संकेत नहीं दिख रहे, लेकिन उसके वरिष्ठ नेता मारे जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान की निंदा की है, लेकिन कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं।

संभावित परिदृश्य: अगर ईरान आगे हॉर्मुज में टैंकरों पर हमले बढ़ाता है, तो अमेरिका-इजराइल पूर्ण नाकाबंदी या सीमित जमीनी अभियान पर विचार कर सकते हैं। लेकिन ईरान की ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4’ जैसी मिसाइल हमलों की लहरें जारी रहेंगी। युद्ध अभी हवाई और मिसाइल स्तर पर है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के हमलों ने इसे क्षेत्रीय युद्ध में बदलने का खतरा पैदा कर दिया है।

गैस क्षेत्रों पर हमले के बाद सऊदी अरब की तैयारी: हमला या बचाव?

सवाल उठता है – साउथ पार्स और उसके बाद ईरानी हमलों के बाद क्या सऊदी अरब अब ईरान पर प्रत्यक्ष हमले की तैयारी में है? तथ्य कहते हैं – नहीं। सऊदी अरब ने ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोका है, लेकिन कोई आक्रामक कार्रवाई नहीं की। रियाद ने कहा है कि “पहले जो थोड़ा विश्वास बचा था, वह पूरी तरह टूट गया है”। सऊदी विदेश मंत्री ने ईरानी हमलों को ‘खतरनाक वृद्धि’ बताया। लेकिन सऊदी अरब के बयानों और कार्रवाइयों में कोई हमले की तैयारी नहीं दिखी।

बल्कि सऊदी अरब ने रक्षा पर जोर दिया – अबू धाबी और रास तनुरा जैसी सुविधाओं पर ड्रोन हमलों को रोका, शायबह फील्ड पर 21 ड्रोन नष्ट किए। ईरान ने सऊदी की समरेफ रिफाइनरी, जुबैल कॉम्प्लेक्स को ‘आगामी घंटों में लक्ष्य’ बताया, लेकिन सऊदी ने कोई जवाबी हमला नहीं किया।

ऐतिहासिक संदर्भ में सऊदी और ईरान लंबे समय से शत्रु हैं – यमन, सीरिया, लेबनान में प्रॉक्सी युद्ध। 2019 में अरामको हमलों के बाद सऊदी ने सतर्कता बढ़ाई थी। लेकिन 2026 में सऊदी अरब का रुख रक्षात्मक है। वह अमेरिका के साथ समन्वय कर रहा है, लेकिन सीधा युद्ध नहीं चाहता क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है।

संभावना है कि सऊदी अरब अमेरिका-इजराइल गठजोड़ में शामिल होकर ईरान की क्षमता को और कमजोर करे, लेकिन प्रत्यक्ष हमला? अभी नहीं होगा । रियाद ने ईरानी राजदूत के बयान का खंडन किया कि सऊदी सुविधाओं पर हमले नहीं हुए। अगर ईरानी हमले बढ़े, तो सऊदी रेड सी रूट (यानबू पोर्ट) का इस्तेमाल बढ़ा सकता है या अमेरिकी सहायता मांग सकता है। लेकिन सऊदी अरब की सेना अभी ईरान पर आक्रमण की तैयारी में नहीं है – वह बचाव और कूटनीति पर फोकस कर रही है।

यह सऊदी की रणनीति है – ईरान को क्षेत्रीय अलगाव में डालना, लेकिन खुद युद्ध में न फंसना। अगर ट्रंप प्रशासन दबाव डाले, तो सऊदी समर्थन बढ़ सकता है, लेकिन फिलहाल कोई आक्रामक तैयारी के संकेत नहीं।

डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल: छोड़ने की कोई बात नहीं

अगला सवाल – क्या डोनाल्ड ट्रंप इजराइल को छोड़ने वाले हैं? जवाब स्पष्ट है – बिल्कुल नहीं। ट्रंप प्रशासन इस युद्ध का सक्रिय भागीदार है। अमेरिकी बमवर्षक (B-2) ने ईरानी परमाणु साइट्स पर हमले किए। अगर ईरान बदला लेता रहा ट्रंप ने खुद ईरान के गैस फील्ड को ‘मैसिवली ब्लो अप’ करने की धमकी दी । उन्होंने कहा कि अमेरिका को साउथ पार्स हमले की पहले जानकारी नहीं थी, लेकिन कुल मिलाकर ट्रंप इजराइल के साथ मजबूती से खड़े हैं।

ट्रंप की इजराइल नीति पहली टर्म से ही प्रो-इजराइल रही – येरुशलम को राजधानी मानना, गोलान हाइट्स पर संप्रभुता मान्यता। 2025-26 में गाजा शांति योजना में भी ट्रंप ने इजराइल को मजबूत समर्थन दिया। ईरान युद्ध में ट्रंप ने कहा कि “हम जीत रहे हैं”। उन्होंने ईरान के खिलाफ हवाई श्रेष्ठता स्थापित करने में अमेरिका की भूमिका को रेखांकित किया।

कुछ विश्लेषक कहते हैं कि ट्रंप नेटनयाहू से थोड़ा असंतुष्ट हैं (गाजा योजना में देरी पर), लेकिन ईरान के मामले में ट्रंप इजराइल को ‘छोड़ने’ की बजाय और मजबूत कर रहे हैं। ट्रंप के बयानों में ईरान को ‘खत्म’ करने की धमकी है, न कि इजराइल को पीछे हटने की।

ट्रंप की रणनीति स्पष्ट है – ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा को कुचलना, क्षेत्र में अमेरिकी हित सुरक्षित रखना और इजराइल को रणनीतिक सहयोगी बनाए रखना। कोई संकेत नहीं कि ट्रंप इजराइल को अकेला छोड़ देंगे। बल्कि यह युद्ध ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का विस्तार है, जिसमें इजराइल प्रमुख साझेदार है।

वैश्विक ऊर्जा संकट: संभावनाएं वास्तव में बढ़ गई हैं

सबसे गंभीर मुद्दा ऊर्जा संकट है। साउथ पार्स हमले और ईरानी जवाबी हमलों ने वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से 20% वैश्विक तेल और एलएनजी गुजरता है। अब यातायात लगभग बंद है। कतर का रास लाफान प्लांट क्षतिग्रस्त, सऊदी रिफाइनरियां प्रभावित।

तेल की कीमतें 70 डॉलर से 100-110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। यूरोपीय गैस कीमतें 40% उछलीं। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि इससे वैश्विक जीडीपी 0.3% घट सकता है और मुद्रास्फीति 0.5-0.6% बढ़ेगी। सीएसआईएस रिपोर्ट कहती है कि लंबे समय तक हॉर्मुज बंद रहने पर तेल 100 डॉलर पार कर सकता है।

भारत जैसे आयातक देशों पर सबसे ज्यादा असर हो रहा है । भारत ईरान से तेल नहीं खरीदता, लेकिन खाड़ी से 60% तेल आयात करता है। कीमतें बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगा, मुद्रास्फीति बढ़ेगी। यूरोप और एशिया में ऊर्जा संकट से औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा।

संभावनाएं वास्तव में बढ़ गई हैं। अगर युद्ध कुछ हफ्ते और चला, तो 2022 जैसा ऊर्जा संकट लौट सकता है – महंगाई, मंदी का खतरा। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ‘जीत’ रहा है, लेकिन ऊर्जा बाजार कह रहे हैं कि दुनिया हार रही है।

कूटनीति की जरूरत, युद्ध की कीमत

ईरान युद्ध हवाई हमलों से ऊर्जा युद्ध की ओर बढ़ रहा है। सऊदी अरब प्रत्यक्ष हमले की तैयारी में नहीं है, बल्कि बचाव कर रहा है। ट्रंप इजराइल को नहीं छोड़ रहे, बल्कि मजबूत समर्थन दे रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा खतरा वैश्विक ऊर्जा संकट है – तेल की कीमतें, मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी।

दुनिया को तत्काल कूटनीति चाहिए। संयुक्त राष्ट्र, चीन, रूस जैसे देश मध्यस्थता करें। ईरान को मिसाइल हमले रोकने चाहिए, अमेरिका-इजराइल को ऊर्जा सुविधाओं से दूर रहना चाहिए। सऊदी अरब जैसे देशों को शामिल कर शांति वार्ता शुरू हो।

भारत को भी सतर्क रहना होगा – वैकल्पिक तेल स्रोत (रूस, अमेरिका), रणनीतिक भंडार बढ़ाना और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर। यह युद्ध न सिर्फ मध्य पूर्व को, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। अगर तुरंत रोका नहीं गया, तो ऊर्जा संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ सकता है।

शांति ही एकमात्र रास्ता है। युद्ध की आग फैलने से पहले उसे बुझाना जरूरी है।

(लेखक वारित पत्रकार और अन्तराष्ट्रीय मामलों के विशेषग्य हैं)

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