सवर्ण और सपा…

ओम प्रकाश सिंह

भाजपा मुतमईन है कि सवर्ण, सपा की गोद में नहीं बैठेगा और कल्याण योजनाओं का मजबूत वोट बैंक उसकी नैया पार करा देगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। सवर्ण वोटरों का रुझान, पिछड़े , दलित और अल्पसंख्यक का गठजोड़ तथा गरीब परिवारों के बीच लोकप्रिय कल्याण योजनाएँ, ये तीनों तत्व वर्तमान में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच चल रहे संघर्ष का केंद्र बिंदु बन गए हैं।


यूजीसी नियमों को लेकर सवर्ण समाज में उठी नाराजगी और पीडीए समुदायों में शिक्षा-रोजगार संबंधी मुद्दों से उपजे असंतोष को लेकर दोनों पार्टियाँ अलग-अलग रणनीति बना रही हैं। लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना , उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और पीएम किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएँ भाजपा के लिए एक ऐसा कोर वोट बैंक तैयार कर चुकी हैं, जिसे कोई भी विपक्षी पार्टी आसानी से तोड़ नहीं सकती।


सवर्ण वोटरों पर भाजपा की मुतमईनी❓❓क्या सपा की ओर कोई शिफ्ट❓


भाजपा का मानना है कि सवर्ण समुदाय उसके साथ मजबूती से खड़ा है और सपा की ओर नहीं जाएगा। 2024 लोकसभा चुनावों में सीएसडीएस-लोकनीति सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का 79% और राजपूतों का करीब 80% वोट भाजपा-एनडीए को मिला था। हालिया यूजीसी नियमों से सवर्ण समाज में नाराजगी जरूर दिख रही है।

सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में सवाल उठ रहे हैं कि सवर्ण अब कहाँ जाएगा❓ कांग्रेस, सपा या अपनी नई पार्टी❓ फिर भी भाजपा का विश्लेषण है कि यह नाराजगी अस्थायी है. सवर्ण वोटरों का बड़ा हिस्सा हिंदुत्व, विकास और स्थिरता के मुद्दों पर भाजपा से जुड़ा हुआ है।

2026-27 विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मण-ठाकुर एकता की कोशिशें और ओबीसी आउटरीच के बीच संतुलन बनाए रखने की भाजपा की रणनीति इसी आत्मविश्वास को दर्शाती है। सपा के पीडीए फोकस के कारण सवर्ण वोटरों में “अपनों की अनदेखी” का भय भी भाजपा के पक्ष में काम कर रहा है।


सपा की पीडीए रणनीति और यूजीसी मुद्दे पर दावा….

दूसरी ओर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) को अपना मुख्य आधार बता रहे हैं। उन्होंने कहा है कि “पीडीए ने भाजपा को हराया है और यूजीसी जैसे मुद्दे पीडीए की वजह से आए हैं”। सपा का दावा है कि यूजीसी नियमों, एनईईटी-यूजीसी नेट विवादों और शिक्षा-रोजगार में आरक्षण संबंधी मुद्दों से पीडीए समुदायों में नाराजगी बढ़ी है, जिसे वह अपने पक्ष में मोड़ रही है. 2024 में सपा ने 37 सीटें जीतकर पीडीए गठजोड़ की ताकत दिखाई थी।

हालाँकि, सपा के अंदरूनी संगठन में अभी भी यादव-मुस्लिम का वर्चस्व है। 97 जिला अध्यक्षों में से करीब 70% यादव या मुस्लिम हैं, जबकि दलितों को केवल 3 पद मिले हैं। मायावती जैसे दलित नेता इसे “राजनीतिक नाटक” बता रही हैं, फिर भी सपा 2027 चुनावों में पीडीए को मजबूत करने की कोशिश में लगी है।


भाजपा की असली ताकत❓गरीबों की कल्याण योजनाएँ और कोर वोट बैंक..

सवर्ण या पीडीए के मुद्दों के बावजूद भाजपा का सबसे मजबूत आधार उन गरीब परिवारों से आता है जिन्हें प्रत्यक्ष लाभ मिला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख योजनाएँ अब “कोर वोटर” बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना उत्तर प्रदेश में अकेले शहरी क्षेत्र में 62 लाख से अधिक परिवारों को लाभ। राष्ट्रीय स्तर पर लाखों घर बन चुके हैं, जिनमें 80% घर महिलाओं के नाम पर हैं। अध्ययनों में पाया गया कि इन योजनाओं ने भाजपा के 2019 और 2024 चुनावी प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाई। उज्ज्वला योजना, देशभर में 10.33 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन , 2025-26 में 25 लाख अतिरिक्त कनेक्शन मंजूर। 2025-26 में ₹12,000 करोड़ का लक्षित सब्सिडी प्रावधान जारी।

स्वच्छ भारत मिशन, ग्रामीण क्षेत्रों में 11 करोड़ से अधिक शौचालय बने। उत्तर प्रदेश में 2.22 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य लाभ और गरिमा का भाव इन योजनाओं की लोकप्रियता बढ़ाता है। पीएम किसान सम्मान निधि की 22वीं किस्त मार्च 2026 में जारी। करोड़ों किसान परिवारों को सालाना ₹6,000 गरीब और छोटे किसानों में यह योजना अत्यंत लोकप्रिय।

ये योजनाएँ मुख्यत ओबीसी, दलित और गरीब सवर्ण परिवारों तक पहुँची हैं। अध्ययनों के अनुसार लाभार्थी अब भाजपा के प्रति वफादार हो गए हैं क्योंकि इनसे सीधा आर्थिक लाभ मिलता है। लाभार्थियों की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं, लेकिन अभी तक इतना बड़ा बदलाव नहीं आया है कि कोई दूसरी पार्टी इनमें से आधा वोट भी आसानी से छीन सके। यही कारण है कि भाजपा इन योजनाओं को अपना “मजबूत कोर वोट बैंक” मानती है।

2027 की चुनौती..

सवर्ण नाराजगी और पीडीए का एकीकरण दोनों पार्टियों के लिए दोधारी तलवार है। भाजपा सवर्ण को टिकाए रखने और कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों को मजबूत करने की रणनीति पर है, जबकि सपा पीडीए को आगे बढ़ाकर सवर्ण वोट के रिक्त स्थान को भरने की कोशिश में है।

लेकिन तथ्य यही बताते हैं कि गरीब परिवारों तक पहुँची योजनाएँ भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हैं। 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में देखना होगा कि सवर्ण का विश्वास, पीडीए का गठजोड़ और कल्याण योजनाओं का वोट बैंक, इनमें से कौन अंतिम फैसला करता है। फिलहाल भाजपा की मुतमईनी इसी तथ्य पर टिकी है कि उसके पास “लाभार्थी” नाम का एक ऐसा वोट बैंक है जिसे तोड़ना आसान नहीं।

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