जुबिली स्पेशल डेस्क
तेहरान/वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच हालात युद्ध जैसे बनते दिख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शीर्ष सलाहकारों के साथ बैठक कर ईरान पर संभावित हमले की रणनीति तैयार कर ली थी और कथित तौर पर तारीख पर भी चर्चा हुई थी।
लेकिन इस प्लानिंग के बीच ब्रिटेन के रुख ने अमेरिकी रणनीति को झटका दे दिया है। पश्चिमी देशों के बीच उभरी यह दरार ट्रंप के ‘मिशन तेहरान’ को फिलहाल अधर में डालती दिख रही है।
परमाणु मुद्दे पर टकराव गहराया
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। ट्रंप प्रशासन ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं पर सख्त रोक चाहता है, जबकि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई झुकने को तैयार नहीं हैं। दोनों पक्षों के बीच दो दौर की बातचीत बेनतीजा रही है।
सूत्रों के मुताबिक अमेरिकी नेतृत्व ने अपने शीर्ष सुरक्षा सलाहकारों के साथ बैठक कर ‘फुल-स्केल’ सैन्य विकल्पों पर मंथन किया है। हालांकि आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

मिडिल ईस्ट में सैन्य हलचल तेज
रिपोर्टों के अनुसार, मध्य पूर्व में अतिरिक्त फाइटर जेट और एयर-टैंकर तैनात किए गए हैं। अमेरिकी विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford को पूर्वी भूमध्य सागर की ओर बढ़ाने की तैयारी बताई जा रही है, जहां वह पहले से मौजूद USS Abraham Lincoln के साथ ऑपरेशन क्षमता बढ़ा सकता है।
ब्रिटेन ने खींची लाल रेखा
जहां कुछ पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ सख्त रुख में दिख रहे हैं, वहीं ब्रिटेन ने दूरी बना ली है। ब्रिटेन सरकार ने कथित तौर पर अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों—हिंद महासागर स्थित डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड—के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की सरकार का तर्क है कि ठोस कानूनी आधार के बिना किसी हमले का समर्थन अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है। ऐसे में ब्रिटेन इस कार्रवाई का हिस्सा बनने से बचना चाहता है।
ट्रंप के लिए नई चुनौती
ब्रिटेन के इस फैसले को अमेरिका-ब्रिटेन रिश्तों में बढ़ती खटास के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच मतभेद बढ़ने से ट्रंप प्रशासन के लिए ईरान के खिलाफ कोई भी बड़ा सैन्य कदम उठाना पहले से ज्यादा जटिल हो सकता है।
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