डा. उत्कर्ष सिन्हा
नेपाल की राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप, खासकर अमेरिकी प्रभाव, की आशंकाएं लंबे समय से चली आ रही हैं। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025 के जेन Z नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के बाद, इन आशंकाओं ने नई ऊंचाइयां छू ली हैं। प्रदर्शनकारियों पर अमेरिकी समर्थन के आरोप लगे, जिसमें अमेरिकी नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (एनईडी) और इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (आईआरआई) जैसी संस्थाओं के माध्यम से फंडिंग और ट्रेनिंग का जिक्र किया गया।अब, नेपाली कांग्रेस के प्रमुख नेता गगन थापा पर भी ऐसे ही आरोप लगने लगे हैं, जो पहले जेन Z नेताओं तक सीमित थे।
चुनावों से ठीक पहले फरवरी 2026 में अमेरिकी सैनिकों की काठमांडू के टुंडिखेल में परेड ने इन आशंकाओं को और हवा दी, जिससे एक बड़े वर्ग में गुस्सा भड़क उठा। प्रसिद्ध गायिका ज्योति मगर सहित कई सेलिब्रिटी ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाया, जो नेपाल में अमेरिकी दखल के खिलाफ बढ़ते असंतोष को दर्शाता है।

ग्रेजोन जैसे खोजी पत्रकारिता प्लेटफॉर्म्स ने लीक दस्तावेजों के आधार पर दावा किया कि अमेरिका ने युवा नेपाली एक्टिविस्टों को संगठित करने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए, ताकि चीन और भारत के बढ़ते प्रभाव को काउंटर किया जा सके। इन आरोपों ने नेपाल की संप्रभुता पर सवाल उठाए, क्योंकि प्रदर्शनों ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार गिरा दी और मार्च 2026 के चुनावों की राह खोली।
जेन Z प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में अमेरिकी हस्तक्षेप के आरोपों की जड़ें गहरी हैं। 2025 के सितंबर में शुरू हुए विरोध, जो सोशल मीडिया प्रतिबंध, भ्रष्टाचार और नेपोटिज्म के खिलाफ थे, जल्दी ही हिंसक हो गए, जिसमें 76 लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने सरकार गिरा दी, लेकिन बाद में कई रिपोर्ट्स ने दावा किया कि यह “स्पॉन्टेनियस” नहीं था। लीक दस्तावेजों से पता चला कि एनईडी ने 2021-2022 में “युवा नेतृत्व: पारदर्शी नीति” प्रोग्राम के तहत 350,000 डॉलर खर्च किए, जिसमें प्रोटेस्ट आयोजन, डिजिटल मॉबिलाइजेशन और लीडरशिप ट्रेनिंग शामिल थी। ग्रेजोन ने इसे खासकर इंडो-पैसिफिक रणनीति में नेपाल को चीन के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए अमेरिकी हितों को बढ़ावा देने का माध्यम बताया ।
नेपाल, जो भारत और चीन के बीच बफर जोन है, में अमेरिका की रुचि मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन (एमसीसी) जैसे प्रोजेक्ट्स से भी जुड़ी है, जिसे कई नेपाली अमेरिकी सैन्य गठबंधन का हिस्सा मानते हैं। इन आरोपों ने जेन Z नेताओं को “अमेरिकी पपेट” करार दिया, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे। प्रदर्शन के बाद उभरी पार्टियां, जैसे राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी), अब चुनावों में युवा वोट बैंक पर निर्भर हैं, लेकिन इन आरोपों ने उन्हें रक्षात्मक बना दिया है।
अब यह आरोप नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गगन थापा तक पहुंच गए हैं। थापा, जो छात्र आंदोलन से उभरे और कई बार गिरफ्तार हुए, को हमेशा से सुधारवादी नेता माना जाता है। लेकिन हाल में, पार्टी के अंदरूनी विवादों में उन्हें “विदेशी प्रभाव” का शिकार बताया जाने लगा। मोहन बहादुर बस्नेत जैसे नेताओं ने थापा पर भ्रष्टाचार जांच आयोग (सीआईएए) को प्रभावित करने का आरोप लगाया, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स इसे अमेरिकी समर्थन से जोड़ती हैं। थापा के पुराने इतिहास में, 2005 में राजतंत्र विरोधी नारों के लिए सेडिशन चार्ज लगे थे, लेकिन अब आरोप अमेरिकी कनेक्शन के हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि थापा की सुधारवादी छवि और युवा अपील उन्हें अमेरिकी हितों के अनुकूल बनाती है, खासकर जब नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। नेपाली कांग्रेस, जो पारंपरिक रूप से भारत-केंद्रित रही, अब अमेरिकी सहायता पर निर्भर दिखती है, और थापा जैसे नेता इसका चेहरा बन सकते हैं। हालांकि थापा ने इन आरोपों को खारिज किया है, लेकिन चुनावों के समय यह राजनीतिक हथियार बन गया है, जो विरोधी पार्टियों जैसे सीपीएन-यूएमएल को फायदा पहुंचा सकता है।
चुनावों से ठीक पहले, 15 फरवरी 2026 को नेपाल आर्मी डे और महाशिवरात्रि के मौके पर टुंडिखेल में अमेरिकी सैनिक बैंड की भागीदारी ने विवाद खड़ा कर दिया। यह कार्यक्रम नेपाल आर्मी की 263वीं वर्षगांठ का था, जिसमें राइफल सैल्यूट, मिलिट्री डेमो और सांस्कृतिक प्रदर्शन हुए। नेपाल आर्मी ने स्पष्ट किया कि अमेरिका, भारत और यूके के बैंड्स की भागीदारी रूटीन मिलिट्री डिप्लोमेसी का हिस्सा है, जो आर्मी-टू-आर्मी सहयोग को मजबूत करती है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल फोटोज और वीडियोज ने इसे “अमेरिकी सैनिकों की परेड” बताकर सनसनी फैला दी, जिससे जनता में गुस्सा भड़का। कई ने इसे अमेरिकी आक्रमण की शुरुआत माना, खासकर जब अमेरिकी जनरल की हालिया नेपाल यात्रा के बाद यह हुआ। नेपाल, जो संप्रभु राष्ट्र है, में विदेशी सैनिकों की मौजूदगी संवेदनशील मुद्दा है, और यह घटना चुनावी माहौल में अमेरिकी हस्तक्षेप की आशंकाओं को बढ़ावा दे रही है।
इस विवाद में नेपाल के सेलिब्रिटीज की मुखर प्रतिक्रियाएं सामने आईहैं। प्रसिद्ध लोक गायिका ज्योति मगर ने सोशल मीडिया पर इस परेड को “संप्रभुता पर हमला” बताते हुए गुस्सा जाहिर किया, ज्योति मगर, जो अक्सर सामाजिक मुद्दों पर बोलती हैं, ने इस घटना को नेपाल की संस्कृति और स्वतंत्रता पर खतरा बताया, जिससे युवा और ग्रामीण वर्ग में असंतोष बढ़ा। अन्य सेलिब्रिटी जैसे बार्षा शाह ने भी आर्मी डे की तस्वीरें शेयर कीं। ये बयान दर्शाते हैं कि अमेरिकी दखल की आशंकाएं अब आम जनमानस में घुस चुकी हैं।अन्य सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर्स ने भी इसे उठाया, जैसे एक यूजर ने लिखा कि “अमेरिकी सैनिकों का परेड नेपाल को यूक्रेन बनाने की साजिश है।” सोशल मीडिया पर #USOutOfNepal जैसे ट्रेंड्स चले, जहां लोगों ने एमसीसी और जेन Z प्रदर्शनों को जोड़ा।
इन घटनाओं का विश्लेषण करें तो अमेरिकी हस्तक्षेप की आशंकाएं अतिरंजित लेकिन आधारित लगती हैं। नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति इसे विदेशी शक्तियों का खेल का मैदान बनाती है। अमेरिका नेपाल में लोकतंत्र और विकास के नाम पर निवेश करता है, लेकिन आलोचक इसे जियो-पॉलिटिकल रणनीति मानते हैं। लेकिन यह नेपाल में राष्ट्रवाद को भड़का रहा है। चुनावों में, ये मुद्दे वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं, जहां सीपीएन-यूएमएल जैसे पार्टियां अमेरिका-विरोधी नैरेटिव पर खेलेंगी।
नेपाल को इन आशंकाओं से निपटने के लिए मजबूत कूटनीति और आंतरिक एकता की जरूरत है, ताकि विदेशी प्रभाव चुनावों को प्रभावित न कर सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अन्तराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं )
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