नेपाल चुनाव 2026: एमाले की मजबूती, जेन-जी की उमंग और बांग्लादेश जैसी संभावित नियति

डा. उत्कर्ष सिन्हा
नेपाल में 5 मार्च 2026 को होने वाले प्रतिनिधि सभा के आम चुनाव देश की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहे हैं। ये चुनाव सितंबर 2025 में जेनरेशन Z के नेतृत्व वाले बड़े विरोध प्रदर्शनों का परिणाम हैं, जिन्होंने पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका और समय से पहले चुनाव की आवश्यकता को जन्म दिया। इस बार 120 से अधिक राजनीतिक दल मैदान में हैं, जिनमें से एक-तिहाई नए दल हैं, जो मुख्य रूप से युवा आंदोलन से उभरे हैं। मतदाताओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें 9 लाख से अधिक नए मतदाता जुड़े हैं और इनमें दो-तिहाई जेन Z पीढ़ी के हैं। यह बदलाव युवा ऊर्जा और नई सोच की उम्मीद जगाता है, लेकिन वर्तमान स्थिति का गहरा विश्लेषण बताता है कि सीपीएन-यूएमएल (एमाले) अभी भी सबसे मजबूत ताकत बनी हुई है, जबकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) जैसी जेन Z नेताओं से भरी पार्टी की स्थिति बांग्लादेश में छात्र नेताओं वाली नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) जैसी हो सकती है—आंदोलन में सफलता मिली, लेकिन चुनावी ताकत और सत्ता में स्थिरता हासिल करने में कमी रही।
एमाले, के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में, नेपाल की राजनीति की मजबूत रीढ़ के रूप में स्थापित है। 2022 के चुनावों में प्रोपोर्शनल वोटों में सबसे आगे रहकर उसने लगभग 27 प्रतिशत वोट हासिल किए और 78-79 सीटें जीतीं। हाल ही में जनवरी 2026 में हुए राष्ट्रीय सभा (ऊपरी सदन) चुनावों में नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन ने 17-18 सीटों पर जीत दर्ज की, जिसमें कांग्रेस को 9 और एमाले को 8 सीटें मिलीं। ओली, 73 वर्षीय अनुभवी नेता, चार बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और पूर्वी नेपाल के झापा-5 जैसे गढ़ों में गहरी जड़ें रखते हैं। उनकी पार्टी की कैडर बेस, संगठनात्मक ताकत, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का क्रेडिट और ग्रामीण-पूर्वी इलाकों में मजबूत पकड़ एमाले को अजेय बनाती है। विरोध प्रदर्शनों के बावजूद एमाले ने अपना वोट बैंक बरकरार रखा है और विश्लेषकों के अनुसार, पारंपरिक दल जैसे एमाले और कांग्रेस अभी भी सीटों के मामले में आगे बने हुए हैं।

दूसरी ओर, आरएसपी 2022 में 21 सीटों के साथ उभरी थी और अब जेन Z आंदोलन का फायदा उठाकर मजबूत हो रही है। पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने के साथ पूर्व काठमांडू मेयर बालेंद्र शाह (बालेन शाह), जो 35 वर्षीय रैपर से राजनेता बने हैं, प्रमुख चेहरा हैं। बालेन को पार्टी ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया है और वे झापा-5 से ओली के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं, जो पुराने और नए राजनीतिक पीढ़ी का प्रतीकात्मक मुकाबला बन गया है। पार्टी ने पारंपरिक घोषणा-पत्र की बजाय “संविदा दस्तावेज” जारी करने की योजना बनाई है, जिसमें वादे न निभाने पर दंड का प्रावधान है। एंटी-करप्शन, सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे युवा मुद्दों पर फोकस है। सुडान गुरुंग जैसे आंदोलनकारी और कुलमान घिसिंग जैसे चेहरे पार्टी को आकर्षण दे रहे हैं। आरएसपी मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों जैसे काठमांडू और पोखरा में मजबूत है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में संगठन अभी भी कमजोर है।
बांग्लादेश का उदाहरण यहां महत्वपूर्ण सबक देता है। 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले कोटा विरोध प्रदर्शनों ने शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार गिरा दी और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी। छात्र नेताओं ने नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) बनाई और “दूसरा गणतंत्र” का नारा दिया, लेकिन फरवरी 2026 के चुनावों में NCP गठबंधन बुरी तरह असफल रहा। बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया, जबकि NCP को महज 6 सीटें मिलीं। छात्र नेता “हीरोज से डड्स” बन गए। इसका मुख्य कारण संगठनात्मक कमी, अनुभवहीनता, वोट बिखराव, गठबंधन टूटना और मतदाताओं की स्थिरता की मांग थी। नेपाल में आरएसपी की स्थिति भी इसी तरह दिखती है—आंदोलन की ऊर्जा है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला ग्रासरूट नेटवर्क, ग्रामीण मुद्दों पर गहराई और अनुभव की कमी स्पष्ट है।
नेपाल के पूरे चुनावी परिदृश्य में मुख्य खिलाड़ी नेपाली कांग्रेस (अनुभवी, मध्यमार्गी), एमाले (वामपंथी, संगठित), माओइस्ट/एनसीपी (कमजोर), आरएसपी (युवा-केंद्रित) और आरपीपी (राजावादी) हैं। चुनाव में हैंग्ड पार्लियामेंट की संभावना मजबूत है, जहां कोई भी दल स्पष्ट बहुमत (138+) नहीं पा सकता। एमाले-कांग्रेस जैसे गठबंधन या अन्य कॉम्बिनेशन संभव हैं। क्षेत्रीय विभाजन स्पष्ट है—पूर्वी और ग्रामीण इलाकों में एमाले मजबूत, शहरी-पश्चिमी क्षेत्रों में आरएसपी और कांग्रेस, तराई में अन्य दल। प्रमुख मुद्दे भ्रष्टाचार, सुशासन, बुनियादी ढांचा, रोजगार और संघीयता हैं। चुनौतियां भी बड़ी हैं—65+ नए दल, वोट बिखराव, सुरक्षा और पहाड़ी-तराई विभेद।
कुल मिलाकर, जेन Z की ऊर्जा ने नेपाल को नया अवसर दिया है, लेकिन बांग्लादेश का अनुभव चेतावनी देता है कि आंदोलन सत्ता नहीं दिलाते—संगठन, अनुभव और व्यापक जनादेश ही सफलता देते हैं। एमाले जैसे स्थापित दल अभी भी सबसे मजबूत हैं, जबकि आरएसपी 30-50 सीटों तक सीमित रह सकती है और किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है, लेकिन सत्ता में टिकना या स्थायी विकल्प बनना मुश्किल लगता है। चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि नेपाल पुरानी राजनीति में लौटेगा या नई दिशा लेगा, लेकिन संकेत साफ हैं कि जेन Z पार्टी का हाल बांग्लादेश छात्र नेताओं जैसा न हो, इसके लिए गहरी जड़ें और व्यावहारिक नीतियां जरूरी हैं।



