जुबिली स्पेशल डेस्क
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद गुरुवार को बांग्लादेश में पहली बार संसदीय चुनाव हो रहा है। चुनाव का संचालन अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में हो रहा है। इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं, खासकर बांग्लादेश के पड़ोसी देशों भारत और पाकिस्तान। यूनुस सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में कड़वाहट आई है, जबकि पाकिस्तान के साथ रिश्ते और करीब हुए हैं। ऐसे में नई सरकार का भारत और पाकिस्तान के प्रति रवैया महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इतिहास और राजनीतिक पृष्ठभूमि
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश दक्षिण एशिया के प्रमुख देश हैं। ये कभी एक ही देश का हिस्सा थे। 1947 में पाकिस्तान भारत से अलग हुआ और 1971 में बांग्लादेश पाकिस्तान से स्वतंत्र हुआ। पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाने वाला बांग्लादेश पाकिस्तान के शासन से त्रस्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र बना। शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश 1971 में एक संप्रभु देश बना।
चुनावी व्यवस्था
बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सदस्य होते हैं, जिनमें से 300 सीटों पर ही मतदान होता है। प्रत्येक सांसद का कार्यकाल पांच साल का होता है। हर निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं और सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है।
बाकी 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं और इनका चुनाव जनता द्वारा नहीं किया जाता। इन सीटों का आवंटन 300 सीधे चुने गए सांसदों की पार्टी के प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाता है। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 151 सीधे चुनी हुई सीटें जीतनी होती हैं।
भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना
भारत और पाकिस्तान में द्विसदनीय प्रणाली है। दोनों देशों में राज्यों के विधानसभा चुनाव होते हैं और बहुमत पाने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री चुने जाते हैं। वहीं, बांग्लादेश में कोई राज्य या मुख्यमंत्री नहीं होता। यहाँ केवल संसद ही सर्वोच्च सत्ता का केंद्र है।
बांग्लादेश में एक ही संसदीय सदन है, जबकि भारत में लोकसभा और राज्यसभा दोनों होते हैं। देश को 8 डिवीजन में बांटा गया है, जिनमें जिले और उपजिले आते हैं। इनका प्रशासन डिविजनल कमिश्नर द्वारा किया जाता है, जिन्हें केंद्र सरकार नियुक्त करती है।
इस चुनाव में पूर्व सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग प्रतिस्पर्धा नहीं कर रही है। इससे पहले अवामी लीग के शासन में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा था, लेकिन यूनुस सरकार ने उस पर से प्रतिबंध हटा दिया है।
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