जुबिली स्पेशल डेस्क
सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुनवाई जारी है। इस बीच राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौजूदगी ने मामले को और अहम बना दिया है।
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने अदालत से बोलने की अनुमति मांगी और कहा कि वह राज्य से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए अपनी बात रखना चाहती हैं।
ममता बनर्जी ने कोर्ट में कहा कि उन्हें कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को छह बार विस्तृत पत्र भेजे गए, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए लड़ रही हैं। उन्होंने खुद को एक साधारण परिवार से आने वाला बताते हुए कहा कि आज इंसाफ रो रहा है।
उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि अगर अनुमति दी जाए तो वह कुछ तस्वीरें और जानकारियां कोर्ट के सामने रखना चाहती हैं। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि SIR का उद्देश्य वोट जोड़ना नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट से नाम हटाना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद लड़की के ससुराल जाने की स्थिति में भी जानकारियों में असमानता हो सकती है, जिसे गलत तरीके से विसंगति माना जा रहा है।
इस पर कोर्ट ने ममता बनर्जी को टोकते हुए कहा कि राज्य की ओर से पैरवी के लिए श्याम दीवान और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकील उपलब्ध हैं। बेंच ने कहा कि कोर्ट पूरी कोशिश करेगी कि समाधान निकले और किसी निर्दोष का नाम वोटर लिस्ट से न हटे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले ही SIR की समयसीमा 10 दिन बढ़ाई जा चुकी है और बिना ठोस वजह के समयसीमा आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।
ममता बनर्जी ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि असम और पूर्वोत्तर राज्यों में SIR क्यों नहीं कराया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान फसलों में व्यस्त हैं और ऐसे समय में उन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं, जबकि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि BLO पर दबाव है और कुछ मामलों में आत्महत्या तक की खबरें सामने आई हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आधार कार्ड के साथ अतिरिक्त प्रमाण पत्र मांगे जा रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों में डोमिसाइल या जाति प्रमाण पत्र जैसी शर्तें लागू नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले केवल पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया शुरू की गई और दो महीने में वह काम करने की कोशिश की जा रही है, जिसमें आमतौर पर दो साल लगते हैं।
वोटर लिस्ट से जुड़े SIR के खिलाफ ममता बनर्जी लगातार मुखर रही हैं। इससे पहले बिहार में SIR को लेकर भी उन्होंने विरोध जताया था। अब अपने राज्य में इस प्रक्रिया के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
32 साल बाद फिर कोर्ट में दलील देने की संभावना
सुप्रीम कोर्ट में आज इसी मामले पर सुनवाई हो रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ममता बनर्जी, मोस्तारी बानू, टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन सहित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। ममता बनर्जी के पास एलएलबी की डिग्री है और यदि वह कोर्ट में दलील रखती हैं तो यह 32 वर्षों बाद होगा, जब वह किसी मामले में बतौर वकील पेश होंगी।
आखिरी बार 1994 में की थी पैरवी
ममता बनर्जी आखिरी बार 10 फरवरी 1994 को पश्चिम बंगाल की एक जिला अदालत में वकील के रूप में पेश हुई थीं। उस मामले में उन्हें सफलता मिली थी और 33 आरोपियों को जमानत दिलाई गई थी। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की है और राजनीति में आने से पहले कुछ समय तक वकालत भी की थी।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
इससे पहले 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और किसी को असुविधा नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने चुनाव आयोग को “लॉजिकल विसंगतियों” वाली सूची ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में प्रदर्शित करने का आदेश दिया था, जहां दस्तावेज और आपत्तियां भी जमा की जा सकें।
कोर्ट के मुताबिक 2002 की वोटर लिस्ट के साथ वंश लिंकिंग में माता-पिता के नाम में अंतर और उम्र के अंतर से जुड़ी विसंगतियों को शामिल किया गया है। इन मानकों के आधार पर राज्य में करीब 1.25 करोड़ वोटर्स को “लॉजिकल विसंगतियों” की सूची में रखा गया है। ममता बनर्जी ने इस मामले में 28 जनवरी को याचिका दाखिल की थी, जिसमें चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है।
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