USS अब्राहम लिंकन के पास चीनी रिसर्च जहाज की मौजूदगी, क्या ईरान को मिल रही जानकारी?

जुबिली स्पेशल डेस्क

दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अरब सागर में चीन का एक रिसर्च जहाज देखे जाने से रणनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस जहाज की मौजूदगी को लेकर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या चीन अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर नजर रखते हुए ईरान को संवेदनशील जानकारियां मुहैया करा रहा है।

शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, चीन का आधुनिक समुद्री वैज्ञानिक रिसर्च जहाज दायांग यीहाओ (ओशन नंबर-1) 19 दिसंबर से भारत के पश्चिम में अरब सागर क्षेत्र में सर्वेक्षण कर रहा है।

यह जहाज चीन का पहला अत्याधुनिक रिसर्च वेसल है, जिसमें समुद्र की गहराई और समुद्र तल की बनावट को रियल टाइम में मैप करने की उन्नत तकनीक लगी है। इसके अलावा यह समुद्र में होने वाली असामान्य आवाज़ों की निगरानी करने में सक्षम है और इसमें सैटेलाइट कम्युनिकेशन व वायरलेस इंटरनेट की सुविधा भी मौजूद है।

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस एक्सपर्ट MenchOsint के मुताबिक, यह चीनी जहाज उस समुद्री क्षेत्र में सक्रिय था, जहां अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन की मौजूदगी बताई जा रही है। हालांकि दोनों जहाजों के बीच सटीक दूरी की पुष्टि नहीं हो सकी है। फिलहाल यह चीनी रिसर्च जहाज अरब सागर में भारत और पाकिस्तान के तटों के पास सक्रिय बना हुआ है।

जानकारी के अनुसार, 27 जनवरी के बाद यह जहाज ईरान के तट से लगभग 171 नॉटिकल मील यानी करीब 320 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित समुद्री क्षेत्र में पहुंच गया था।

गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और आंतरिक हालात को लेकर चिंता जताते हुए सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन को दक्षिण चीन सागर से मिडिल ईस्ट क्षेत्र में तैनात किया गया है।

तनाव के बीच ईरान ने भी रणनीतिक होर्मुज स्ट्रेट में दो दिनों के लाइव फायर नौसैनिक अभ्यास की घोषणा की है। यह इलाका वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल आपूर्ति इसी मार्ग से होती है।

इस पूरे घटनाक्रम पर चीन ने संतुलित रुख अपनाया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि बीजिंग बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से विवाद सुलझाने का समर्थन करता है। उल्लेखनीय है कि चीन और ईरान के बीच वर्ष 2016 में रणनीतिक साझेदारी समझौता हुआ था, जिसके तहत रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी थी।

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