शिवराज की राह में ज्योतिरादित्य के तेजपुंज की चकाचौंध
कृष्णमोहन झा

मध्य प्रदेश में शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार के 11 दिन बाद नए मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा तो कर दिया गया लेकिन अभी भी यह कहना मुश्किल है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिन 28 मंत्रियों को अपनी सरकार में शामिल किया था वे सब मंत्री अपने अपने विभागों से पूरी तरह खुश हैं।
मुख्यमंत्री के लिए सबको खुश कर पाना संभव भी नहीं था क्योंकि मुख्यमंत्री अपने विश्वासपात्र मंत्रियों को ही सारे महत्वपूर्ण विभाग सौपकर ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराजगी का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं थे।
विभागों के बंटवारे में सिंधिया की मर्जी का सम्मान करना उनकी विवशता बन गया था सिंधिया के साथ ही उनके गुट के 22 विधायकों ने अगर कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल होने का फैसला नहीं किया होता तो भाजपा की लगभग 14 महीने के अंतराल के बाद ही सत्ता में वापसी की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी इसलिए मुख्यमंत्री को अब इस कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिस तरह उन्हें पहले मंत्रिमंडल विस्तार और उसके बाद नए मंत्रियों को विभागों के वितरण के मामले में ज्योतिरादित्य सिंधिया की मर्जी का सम्मान करने के लिए विवश होना पडा है उसी तरह सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों में भी सिंधिया की राय अहम साबित होना तय है। मैंने पहले भी अपने एक लेख में यह संभावना व्यक्त की थी मध्यप्रदेश में भाजपा की नई सरकार में सत्ता के दूसरे केंद्र ज्योतिरादित्य सिंधिया बनेंगे।
शिवराज सिंह चौहान का भले ही लगातार 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एकाधिकार रहा हो परंतु तब और अबकी स्थिति में बहुत फर्क है। वे खुद भी यह मान चुके हैं कि उन्हें इस पारी में ‘गरलपान’ के लिए तैयार रहना होगा। पहले मंत्रिमंडल विस्तार और फिर नए मंत्रियों को विभागों के वितरण में उन्हें जो कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है उससे यह संकेत मिल गए हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान को इस पारी में फ्री हैंड न मिल पाने का मलाल जब तब सताता रहेगा।
शिवराज सरकार में उपमुख्यमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार नरोत्तम मिश्र को इस विभाग वितरण में यद्यपि महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मंत्रालय छोड़ना पडा है परंतु उनकी नंबर दो की हैसियत बरकरार है। आगे चलकर उन्हें उप मुख्यमंत्री पद से भी नवाजा सकता है परंतु ज्योतिरादित्य सिंधिया जिस तरह मंत्रिमंडल विस्तार और विभाग वितरण में अपना दबदबा बनाए रखने में सफल हुए हैं उसे देखते हुए यह संभावनाएं भी बलवती प्रतीत हो रही हैं कि वे भी अपने किसी वफादार मंत्री को सरकार में उपमुख्यमंत्री पद देने का दबाव बना सकते हैं।
सिंधिया खेमे के मंत्रियों को सरकार में महत्वपूर्ण विभाग हासिल करने में मिली सफलता इस हकीकत की ओर भी इशारा करती है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया वर्तमान शिवराज सरकार में अपने इन मंत्रियों के माध्यम से दबदबा बनाए रखने में सफल होते रहेंगे। इस समय कोरोना संकट जिस तरह पूरे देश के साथ ही मध्य प्रदेश में तेजी से पांव पसार रहा है उसे देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय हासिल करने में मिली सफलता को सिंधिया के दबदबे का ही परिचायक मानना गलत नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने यद्यपि वित्त, लोक निर्माण, चिकित्सा शिक्षा, नगरीय प्रशासन, सहकारिता, खनिज संसाधन एवं श्रम और उच्च शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग उन्हीं मंत्रियों को सौंपे हैं जो हमेशा से ही भाजपा की टिकट पर चुनाव जीते रहे हैं परंतु सिंधिया गुट के मंत्रियों को मिले विभाग भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। विभाग वितरण में भाजपा और सिंधिया गुट के बीच संतुलन साधने में मुख्यमंत्री को कितनी कड़ी मशक्कत करना पड़ी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मंत्रिमंडल विस्तार के 12 दिन बाद विभागों का वितरण संभव हो पाया और अब भी यह कहना मुश्किल है कि भाजपा खेमे के सभी मंत्री उन्हें दिए गए विभागों से पूरी तरह संतुष्ट हैं। कई महत्वपूर्ण विभागों के लिए भाजपा और सिंधिया गुट के बीच मची खींचतान के कारण मुख्यमंत्री ने कुछ विभाग अपने पास रखकर संतुलन बनाने की कोशिश की है जिनमें जन संपर्क विभाग प्रमुख है।

सिंधिया गुट के मंत्रियों की खुशी को तरजीह देना मुख्यमंत्री की विवशता बन गया था क्योंकि इस सरकार का भविष्य उन 22 विधान सभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनावों के नतीजों से ही तय होना है जहां से सिंधिया गुट के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। भाजपा के सामने यह धर्म संकट भी है कि वह इन क्षेत्रों के समर्पित पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को सिंधिया गुट के उन पूर्व विधायकों को जिताने की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए कैसे तैयार करे जो गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीते थे। इन चुनाव क्षेत्रों से जो उम्मीदवार गत विधान सभा चुनावों में भाजपा की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे उनके सामने अब मन मसोस कर रह जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
शिवराज सरकार में महत्वपूर्ण विभाग हासिल करने में सफल हुए अनुभवी मंत्रियों में नरोत्तम मिश्र, गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह जगदीश देवडा, विजय शाह, ब्रजेंद्र प्रताप सिंह, विश्वास सारंग, मोहन यादव आदि शामिल हैं परंतु कुछ मंत्रियों को अपना मनचाहा विभाग न मिल पाने का मलाल है फिर भी वे राजेंद्र शुक्ल, गौरीशंकर बिसेन, अजय विश्नोई, जैसे उन पूर्व मंत्रियों से खुद को अधिक भाग्यशाली मान रहे होंगे जिनकी वर्तमान शिवराज सरकार में मंत्री पद मिलने की उम्मीदों पर पानी फिर चुका है। अब देखना यह है कि उन्हें निगम, मंडलों का मुखिया बनाकर अथवा संगठन में महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी सौंप कर संतुष्ट करने में पार्टी को कितनी सफलता मिलती है। इस बीच मंत्री पद से वंचित कर दिए गए वरिष्ठ भाजपा विधायक अजय विश्नोई ने तो अपनी नाराजगी छिपाने से भी परहेज नहीं किया है।
उन्होंने एक ट्वीट के जरिए तंज़ कसा है- ‘इस हाथ दे उस हाथ ले ‘ का शानदार उदाहरण प्रस्तुत हुआ प्रदेश की राजनीति में’। गौरतलब है कि हाल में ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थामने वाले बड़ा मलहरा विधायक प्रद्युम्न लोधी को आनन फानन में नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष पद से नवाज दिया गया है। इसी तरह वारासिवनी के निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को भी खनिज विकास निगम का अध्यक्ष पद भाजपा सरकार को समर्थन देने के पुरस्कार स्वरूप ही प्राप्त हुआ है। इसलिए अजय विश्नोई का इशारा किस तरफ है यह समझना कठिन नहीं है।
बहरहाल नए मंत्रियों को विभाग वितरण हो जाने के बाद सभी मंत्रियों ने अपना कार्यभार भी संभाल लिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को बधाई देते हुए यह अपील की है कि उन्हें मध्यप्रदेश को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने की दिशा में पूरे संकल्प भाव से आगे बढना है। परंतु उससे भी पहले मुख्यमंत्री को सरकार के सभी मंत्रियों के बीच तालमेल कायम करने की कठिन चुनौती है। इस चुनौती से पार पाने के बाद ही मुख्यमंत्री अपने सुनहरे स्वप्न को साकार करने की उम्मीद कर सकते हैं।
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