त्रासदी की ग़ज़ल : रोटियाँ तो रेलवाली पटरियाँ सब खा गईं

संकट काल में संवेदनाएं झकझोरती है और कलमकार उसे अल्फ़ाज़ की शक्ल में परोस देता है. ये वक्त साहित्य रचता है और ऐसे वक्त के साहित्य को बचा कर रखना भी जरूरी है. जुबिली पोस्ट ऐसे रचनाकारों की रचनाएं आपको नियमित रूप से प्रस्तुत करता रहेगा ।

सुपरिचित कवियत्री रचना मिश्रा नियमित रूप से पीड़ित वर्ग की आवाज़ अपनी कविताओं के ज़रिये उठाती रही हैं. कोरोना काल में देश की सड़कों से गुज़रते मजदूरों के दर्द को जिस अंदाज़ में उन्होंने महसूस किया है उसे वैसा ही आप तक पहुंचाया जा रहा है.

 

रास्ता 

किस जगह जाकर मिलेगा मिलने वाला रास्ता।
मुन्तज़िर बोला कि मिलते मिलते मिलता रास्ता।

ज़िन्दगी में एक दिन कुछ यूँ अचानक हो गया,
एक हम थे एक था सुनसान लम्बा रास्ता।

आँख से बहते रहे आँसू बराबर जिस घड़ी,
हो के बेपरवाह बस हँसता रहा था रास्ता।

वक़्त जब होता बुरा तो जान लो ये मान लो,
मंज़िलों से कर हबीबी मुँह चिढ़ाता रास्ता।

आज इक मजदूरनी का पूछता बच्चा यहाँ
माँ बता दो दूर कितना अपने घर का रास्ता।

रोटियाँ तो रेलवाली पटरियाँ सब खा गईं,
और मजदूरों को देखो लील बैठा रास्ता।

इक महामारी के कारण कब से ठहरा है यहाँ,
आज चलने के लिये पल पल तरसता रास्ता।

हर क़दम पर मौत को कहते सुना है आजकल,
ज़िन्दगी केवल तुम्हारी एक पल का रास्ता।

लगता जितना पास आया पास आया देखिये,
उतना ज़्यादा दूर जाता दूर जाता रास्ता।

साथ तुम चलने का वादा गर करोगे ही नहीं,
फिर भला कैसे कटेगा तनहा तनहा रास्ता।

रास्ते के दुःख को रचना देख कर माँगे दुआ,
हो ही जाये ख़ुशनुमा पहले के जैसा रास्ता।

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