जानिए गाँधी जी के अंतिम पलों के गवाहों की कहानी 

नेशनल डेस्क 

 

नई दिल्ली। मृदुला गांधी भारतीय इतिहास का एक जाना-पहचाना चेहरा है। जिसने आखिरी दो साल में महात्मा गाँधी के साथ ‘सहारा’ बनकर साये की तरह रही। फिर भी यह चेहरा लोगों के लिए एक पहेली है। 1946 में सिर्फ 17 वर्ष की आयु में यह महिला महात्मा की पर्सनल असिस्टेंट बनीं और उनकी हत्या होने तक लगातार उनके साथ रही। फिर भी मनुबेन के नाम से मशहूर मृदुला गांधी ने 40 वर्ष की उम्र में अविवाहित रहते हुए दिल्ली में गुमनामी में दम तोड़ा।
30 जनवरी 1948 का वह काला दिन जिसकी शाम में गांधीजी रोजाना की तरह अपने घर से बगीचे में होने वाली प्रार्थना सभा के जा रहे थे। हमेशा की तरह उनके साथ उनकी दो अनुयायी मनु और आभा उनके साथ थी। 78 वर्षीय देश के बापू ने जैसे ही प्रार्थनासभा मंच की सीढ़ियों पर चढ़ ही रहे थे की अचानक ख़ाकी कपड़ों में एक आदमी भीड़ से निकलता है और मनु को एक तरफ़ धकेल कर पिस्टल निकाल कर दुर्बल नेता के सीने और पेट में तीन गोलियां लगातार चला देता है। गांधीजी गिर जाते हैं और उनके मुँह से ‘हे राम…’ निकलता है और महात्मा गाँधी दम तोड़ देते।

इस घटना कुछ दिन पहले ही मई 1947 में महात्मा गाँधी ने मनु से कहा था कि उनकी यह इच्छा है कि वो उनके अंतिम वक़्त की गवाह बने। वर्ष 1943-44 में मनु को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार किया गया था। जब मनु को गिरफ्ता किया गया था उस वक़्त उनकी आयु सिर्फ 14 वर्ष थी और मनु उस समय के कैदियों में सबसे कम आयु की थी। यही पर उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी से हुई थी और लगभग एक साल गाँधी जी के साथ जेल में व्यतीत किया था।

[toggle title=”यह भी पढ़े” state=”open”]  गांधी के आइने में आज की पत्रकारिता

NRC का अल्पसंख्यकों या धर्म विशेष से लेनादेना नहीं [/toggle]

जेल में ही मनु ने डायरी लिखना शुरू कर दिया था और यह डायरी 12 खंडों में भारत के अभिलेखागार में आज भी संरक्षित हैं। ये सभी डायरी गुजराती भाषा में लिखी गई थी। जिसमे गांधी के भाषणों और पत्रों का भी जिक्र प्रमुखता से किया गया है। इतिहासकार के अनुसार जब गांधी जी को गोली लगी तो वो मनु पर गिर गए थे।  उस वक़्त उनके साथ हमेशा रहने वाली उनकी डायरी अचानक उनके हाथों से छूट गई थी। इसके बाद से मनु ने अपने साथ डायरी रखना बंद ही कर दिया था। मनु ने कई किताबें लिखीं और अपने जीवन के आखिरी पलों  में भी वो गांधी के बारे में बातें करती रहीं। उनका निधन 1969 में 42 साल की उम्र में हो गया। 

डायरी के पहले भाग से मनु के व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है कि वो एक असाधारण और जुनूनी लड़की थीं, जिनकी सोच अपने समय से काफ़ी आगे की थी। डायरी में उन्होंने अपने क़ैद के दिनों के बारे में काफ़ी विस्तार से लिखा है। महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी का स्वास्थ्य काफ़ी तेज़ी से गिर रहा था। मनु ने लिखा है कि वो उनकी बिना थकावट महसूस किये देखभाल करती थीं।
सब्जियां काटना, खाना बनाना, कस्तूरबा की मालिश करना और उनके बालों में तेल लगाना, सूत कातना, प्रार्थना करना, बर्तन साफ़ करने जैसे कई दैनिक काम वो किया करती थीं। उनकी डायरी का अनुवाद करने वाले त्रिदीप सुह्रद लिखती हैं कि  “लेकिन आपको याद रखना होगा कि वो गांधी और उनकी पत्नी और सहयोगियों के साथ जेल में थीं। बतौर क़ैदी उनका यह स्वैच्छिक दायित्व था. ज़िंदगी लाचार और उदास भले ही प्रतीत हो लेकिन वो आश्रम के नियमों को सीख रही थीं।”

[tie_slideshow]

[tie_slide] यह भी पढ़े : जानिए गाँधीजी की 150वीं जयंती पर देश में क्या-क्या है तैयारी [/tie_slide]

[tie_slide] यह भी पढ़े : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर PM मोदी-सोनिया ने राजघाट पहुंच दी श्रद्धांजलि [/tie_slide]

[/tie_slideshow]

गांधी और उनके सहयोगियों के साथ उनका जेल का जीवन पूरी तरह से उदासीन नहीं थी। मनु ग्रामोफोन पर संगीत सुनती थीं। लंबी सैर पर निकलती थीं। वो कस्तूरबा के साथ कैरम खेलती थीं। उन्होंने इस दौरान चॉकलेट भी बनाना सीखा था। डायरी में कुछ दुख भरी घटनाओं का भी ज़िक्र है। उन्होंने दो मौतों के बारे में लिखा है, जिन्होंने गांधी को अंदर से तोड़ कर रख दिया था।  ये मौतें थीं महादेव देसाई और कस्तूरबा गांधी की। महादेव देसाई गांधी के निजी सचिव थे। फ़रवरी 1944 में कस्तूरबा गांधी की मौत हो गई थी। इसके पहले के कुछ दिन काफ़ी दुख भरे थे। एक रात कस्तूरबा अपने पति से कहती हैं कि वो काफ़ी दर्द में हैं और “ये मेरी आख़िरी सांसें हैं।” गांधी कहते हैं, “जाओ, लेकिन शांति के साथ जाओ, क्या तुम ऐसा नहीं करोगी?”

सर्दियों की एक शाम कस्तूरबा की मौत हो गई। उस वक़्त उनका सिर गांधी की गोद में था और गांधी अपनी आंखें बंद कर अपने सिर को उनके सिर पर रख देते हैं, जैसे वो उन्हें आशीर्वाद दे रहे हों। मनु लिखती हैं, “उन्होंने एक साथ अपना जीवन गुज़ारा था। अंतिम वक़्त में वो अपनी ग़लतियों के लिए उनसे क्षमा मांग रहे थे और उन्हें विदाई दे रहे थे। उनकी नब्ज़ रुक जाती है और वो अंतिम सांस लेती हैं। “
मनु जैसे ही व्यस्क हुईं, उनकी लेखनी में काफ़ी बदलाव देखने को मिला। यह लंबी और विचारों से भरी होती थी। अंत में मनु गांधी एक बेहद समझदार और परिपक्व महिला प्रतीत होती हैं जो दुनिया के सबसे करिश्माई और ताक़तवर नेताओं में से एक के सामने ख़ुद को मुखर करने में पूरी तरह से सक्षम पाती हैं।

Related Articles

Back to top button