योगी के गढ़ में बीजेपी को किस बात का है डर

न्‍यूज डेस्‍क

लोकसभा चुनाव अब अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच गया है। यूपी की 13 सीटों पर अगले चरण में 19 मई को मतदान होगा। बीजेपी के लिए यह चरण बेहद अहम माना जा रहा है।

2014 आम चुनाव में बीजेपी ने इन सभी सीटों पर फतह हासिल की थी। पार्टी नेताओं पर पिछले प्रदर्शन को दोहराने का दबाव है। हालांकि, इस बार उनके सामने कई चुनौतियां है।

समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठबंधन ने मोदी-शाह के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। वहीं, कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को मैदान में उतार कर पूर्वांचल की कई सीटों पर बीजेपी के लिए जीत की राह कठीन कर दी है।

इसके अलावा बीजेपी को भीतरघात से भी जूझना पड़ रहा है। एनडीए के साथी ओम प्रकाश राजभर कई सीट पर गठबंधन और कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं। साथ ही वो सांसद और नेता जिनका टिकट कट गया है, उनके विरोधी स्‍वर से भी पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं।

बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह को इस बात का डर भी है कि जिस तरह उपचुनाव में पार्टी को योगी के गढ़ गोरखपुर में करारी हार मिली थी, वैसा कुछ इस बार भी न हो जाए।

इसी वजह से पूर्वांचल की कई सीटों पर जिसे योगी आदित्‍यनाथ के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है वहां भी प्रत्‍याशी सीएम योगी के बजाए पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं।

गोरखपुर में पार्टी प्रत्‍याशी रवि किशन शुक्‍ला योगी के गढ़ में मोदी के नाम से वोट मांग रहे हैं। हालांकि, योगी आदित्यनाथ अपनी पारंपरिक सीट गोरखपुर को इस बार पार्टी को वापस दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं। इसीलिए उन्‍होंने पार्टी प्रत्‍याशी रवि किशन शुक्‍ला को जीताने के लिए खुद कमान संभाली है।

योगी के साथ उनकी सेना हिन्दू युवा वाहिनी भी रवि के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है और कभी “गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है” का नारा लगाने वाले अब “अश्वमेध का घोड़ा है, योगीजी ने छोड़ा है” का नारे लगा रहे हैं।

ब्राह्मण वोट दो खेमों में बंटा

गोरखपुर बीजेपी का मजबूत किला रहा है, लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से पार्टी का ग्राफ ऊपर नहीं चढ़ सका है, जिसकी मुख्‍य वजह ब्राह्मण वोटों का दो खेमों में बंटना बताया जा रहा है।

दरअसल, साल 2017 में अप्रैल में लूट के एक मामले में पूर्वांचल के बाहुबली और पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी के घर छापेमारी हुई थी, जिसके बाद से ब्राह्मण दो खेमे में बंट गए थे। एक खेमा मंदिर की तरफ और दूसरा तिवारी हाता से जुड़ गया था। इससे पहले ब्राह्मण वोटरों का झुकाव मंदिर की तरफ ही रहता था।

जानकारों की माने तो इस छापेमारी ने ब्राह्मण वोटबैंक में सेंधमारी का काम किया था। अगर ब्राह्मण नहीं बंटे होते तो उपचुनाव में बीजेपी कैंडिडेट उपेंद्र दत्त शुक्ला को मुंह की नहीं खानी पड़ती।

गोरखपुर सीट पर वैसे तो सीधी टक्कर महागठबंधन और बीजेपी के बीच है, लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार से सीधा नुकसान बीजेपी को हो रहा है। जातीय समीकरण के बल पर गठबंधन के प्रत्याशी राम भुआल निषाद भी कड़े मुकाबले में हैैं। कांग्रेस के मुधसूदन त्रिपाठी ने इस खेल को और कठिन बना दिया है। मधूसुदन तिवारी साफ छवि के लिए जाने जाते हैं और ब्राह्मणों के बीच में उनकी अच्छी खासी पैठ है। वह बाहुबली हरि शंकर तिवारी के भी करीबी माने जाते हैं।

हिंदू युवा वाहिनी

इसके अलावा पूर्वांचल की लगभग हर सीट अपना दबदबा कायम कर चुकी हिंदू युवा वाहिनी में दरार भी योगी और बीजेपी के लिए टेंशन बढ़ा दी है। इसके संस्थापक सदस्य रहे सुनील सिंह हिंदू युवा वाहिनी से अलग हो गए हैं। जिसके बाद वाहिनी के दो खेमे हो गए हैं।सुनील सिंह अपना नामांकन निरस्त होने के बाद गठबंधन उम्मीदवार का परचम फहरा रहे हैं।

सीएम योगी आदित्यनाथ अपने गढ़ में अपनी ही सेना की कार्यप्रणाली को लेकर टेंशन में हैं। उनकी यह सेना है हिन्दू युवा वाहिनी जो उनकी तमाम हिदायतों के बाद उस स्तर पर सक्रिय नहीं दिख रही है जैसे योगी के चुनाव लड़ने के दौरान दिखती थी।

सवर्ण बनाम पिछड़ी जाति की लड़ाई?

गोरखपुर में लगभग कुल 19 लाख वोटर हैं, जिनमें 3 लाख 90 हज़ार से 4 लाख तक निषाद-मल्लाह वोटर हैं। 1 लाख 60 हज़ार मुसलमान वोटर, 2 से ढाई लाख ओबीसी (कुर्मी, मौर्या, राजभर आदि ), 1 लाख 60 हज़ार यादव, डेढ़ से दो लाख ब्राह्मण, डेढ़ लाख तक क्षत्रिय, एक लाख बनिया और डेढ़ लाख सैंथवार वोटर हैं। यानी निषाद वोटर निर्णायक स्थिति में रहते हैं।

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