जल सहेलियों की अविरल निर्मल यमुना यात्रा में उभरकर आई यमुना की पीड़ा

संजय सिंह
मथुरा में बहती यमुना को देखते हुए मन में एक साथ कई भाव उठते हैं—स्मृति, श्रद्धा और चिंता। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी उत्तराखंड के हिमालय में स्थित यमुनोत्री हिमनद से निकलकर हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से होती हुई प्रयागराज में गंगा से मिलती है। लगभग 3.66 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला इसका बेसिन गंगा प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और अनुमानतः गंगा बेसिन के जल प्रवाह में इसका योगदान लगभग 40 प्रतिशत माना जाता है। कभी इसे कालिंदी कहा गया, कभी इसे कृष्ण की लीलाओं की साक्षी माना गया, तो कभी आगरा और इटावा के खेतों की जीवनरेखा के रूप में देखा गया। दिल्ली, मथुरा और वृंदावन जैसे नगरों की सांस्कृतिक स्मृति में यह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता का आधार रही है। परंतु आज जब हम इसके तट पर खड़े होते हैं तो प्रश्न उठता है—क्या हम सचमुच इसके साथ खड़े हैं?
यमुना बेसिन में छह करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं। अकेले दिल्ली महानगर की आबादी लगभग दो करोड़ है। यही वह क्षेत्र है जहाँ नदी पर सबसे अधिक दबाव दिखाई देता है। एक गंभीर तथ्य यह है कि यमुना की कुल लंबाई का मात्र लगभग 2 प्रतिशत हिस्सा, यानी दिल्ली का लगभग 22 किलोमीटर का खंड, नदी के कुल प्रदूषण का लगभग 70 से 80 प्रतिशत भार वहन करता है। दिल्ली से प्रतिदिन लगभग 3,000 मिलियन लीटर से अधिक सीवेज उत्पन्न होता है। यद्यपि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की स्थापना और विस्तार हुआ है, फिर भी उपचार क्षमता और वास्तविक निर्वहन के बीच अंतर बना रहता है। कई स्थानों पर जल में BOD (Biochemical Oxygen Demand) मानक से कई गुना अधिक दर्ज की गई है और घुलित ऑक्सीजन (DO) स्तर शून्य के निकट पाया गया है, जो जलीय जीवन के लिए अत्यंत घातक स्थिति को दर्शाता है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि नदी की सांस रुकने का संकेत है।
पिछले तीन दशकों में यमुना की स्थिति सुधारने के लिए अनेक योजनाएँ बनीं। 1993 में आरंभ हुई यमुना एक्शन प्लान के अंतर्गत हजारों करोड़ रुपये व्यय किए गए। इसके विभिन्न चरणों में सीवेज उपचार संयंत्रों का निर्माण, नालों का इंटरसेप्शन और डायवर्जन, तथा शहरी अवसंरचना के विकास के प्रयास किए गए। बाद के वर्षों में नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत भी यमुना के लिए परियोजनाएँ स्वीकृत की गईं। इन प्रयासों को नकारा नहीं जा सकता; संरचनाएँ खड़ी हुईं, क्षमता बढ़ी, निगरानी तंत्र विकसित हुए। परंतु एक बुनियादी सत्य आज भी हमारे सामने खड़ा है—नदी केवल पाइपलाइन और प्लांटों से नहीं बचती; वह उन लोगों से बचती है जो उसके साथ रहते हैं।
हम अपने घर का आँगन साफ रखते हैं, सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न फैलाने की शिक्षा देते हैं, पर वही कचरा जब नालों के माध्यम से नदी तक पहुँचता है तो वह हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है। नदी सार्वजनिक है, और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी अक्सर निजी संपत्ति जितनी गहरी नहीं होती। अपशिष्ट को उपचारित किए बिना जलधाराओं में छोड़ना केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि नागरिक आचरण का प्रश्न है। जिस दिन प्रत्येक नागरिक यह स्वीकार कर लेगा कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी सामाजिक अनुशासन का हिस्सा है, उसी दिन से नदियों के पुनर्जीवन की वास्तविक शुरुआत होगी।
यमुना का प्रश्न केवल पर्यावरण का नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी है। प्रदूषित जल से जलजनित रोगों का जोखिम बढ़ता है। जलीय जैव-विविधता प्रभावित होती है; कई पारंपरिक मछली प्रजातियों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। यदि नदी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर गिरता है तो मछलियाँ मरती हैं; यदि रासायनिक तत्व बढ़ते हैं तो वह कृषि और पेयजल दोनों को प्रभावित करते हैं। प्रदूषित जल से सिंचाई मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादकता पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। भूजल पुनर्भरण भी तब प्रभावित होता है जब सतही जल प्रदूषित हो। इसलिए यमुना की चिंता भविष्य की चिंता है—स्वास्थ्य, आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन की चिंता।
इसी संदर्भ में जल सहेलियों द्वारा निकाली जा रही अविरल-निर्मल यमुना यात्रा का महत्व विशेष रूप से सामने आता है। यह यात्रा किसी के विरोध में नहीं, बल्कि सहभागिता के पक्ष में है। यह लोगों को उनकी अपनी नदी से पुनः जोड़ने का प्रयास है। जब जल सहेलियाँ तटवर्ती गाँवों और कस्बों में जाकर पूछती हैं—“क्या आपको याद है, यह नदी पहले कैसी थी?”—तो यह प्रश्न आंकड़ों से अधिक गहरा प्रभाव डालता है।
एक बुजुर्ग अपने बचपन की स्मृतियाँ साझा करता है, जब नदी का जल स्वच्छ और प्रवाह प्रबल था। एक किसान बताता है कि अब उसे सिंचाई के वैकल्पिक स्रोत खोजने पड़ते हैं। एक युवा स्वीकार करता है कि एकल-उपयोग प्लास्टिक से परहेज करना उसके हाथ में है। यह संवाद जिम्मेदारी को स्थानीय बनाता है। नदी कोई दूर की नीति नहीं, वह पास की वास्तविकता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताते हैं कि नदियों का पुनर्जीवन केवल सरकारी परियोजना से संभव नहीं होता। यूरोप में टेम्स और राइन जैसी नदियों में सुधार तब आया जब समुदाय, उद्योग और प्रशासन ने मिलकर दीर्घकालिक प्रतिबद्धता निभाई। भारत में भी कई क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी से छोटी नदियों और तालाबों का पुनर्जीवन संभव हुआ है। जब समाज स्वयं नदी का संरक्षक बनता है, तब परिवर्तन टिकाऊ होता है। यदि यमुना बेसिन में नदी-मित्र समूह सक्रिय हों, स्कूलों में नदी-पाठ पढ़ाया जाए, धार्मिक संस्थान पर्यावरण-सम्मत अनुष्ठानों को बढ़ावा दें, और औद्योगिक इकाइयाँ अपने अपशिष्ट प्रबंधन में पारदर्शिता दिखाएँ, तो यह सामूहिक प्रयास नदी को राहत दे सकता है।
अविरल का अर्थ केवल निरंतर बहाव नहीं, बल्कि अवरोधों से मुक्त जीवन है। निर्मल का अर्थ केवल स्वच्छ जल नहीं, बल्कि स्वच्छ मनोभाव भी है। जब लगभग छह करोड़ लोग अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे संकल्प लेते हैं—कचरा पृथक्करण, अपशिष्ट उपचार, जल संरक्षण, प्लास्टिक का सीमित उपयोग—तो यह छोटे कदम मिलकर बड़ी धारा बन सकते हैं। पदयात्रा उस चेतना का बीज बो रही है। बीज आज बोया जाए तो वृक्ष बनने में समय लगेगा, पर बिना बीज के वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती।
यमुना के तट पर खड़े होकर यदि हम यह तय करें कि यह नदी हमारी साझी विरासत है और इसे अगली पीढ़ी तक बेहतर रूप में पहुँचाना हमारा दायित्व है, तो यही सबसे बड़ा परिवर्तन होगा। योजनाएँ चलती रहेंगी, तकनीकी सुधार होते रहेंगे, परंतु वास्तविक बदलाव तब आएगा जब समाज अपनी भूमिका स्वीकार करेगा। जल सहेलियों की यह यात्रा उसी स्वीकार का निमंत्रण है। संदेश सरल है—नदी को केवल देखिए मत, उससे जुड़िए।
(लेखक जल सहेली संगठन के संस्थापक हैं और जल सहेलियों की अविरल-निर्मल यमुना यात्रा में अनवरत सहभागी हैं)



