जुबिली स्पेशल डेस्क
अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया पूरी कर ली है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले दिन शुरू हुआ यह फैसला अब 22 जनवरी 2026 को लागू हो गया है। इसके साथ ही अमेरिका अब WHO का सदस्य देश नहीं रहा।
WHO की फंडिंग पूरी तरह बंद
ट्रंप प्रशासन ने 20 जनवरी 2025 को एक कार्यकारी आदेश जारी कर WHO से बाहर निकलने का ऐलान किया था। इसके तहत अमेरिका ने संगठन को दी जाने वाली सभी तरह की फंडिंग बंद कर दी।
साथ ही जिनेवा स्थित WHO मुख्यालय और दुनिया भर के अन्य कार्यालयों से अपने कर्मचारियों और ठेकेदारों को वापस बुला लिया गया। अब जिनेवा स्थित WHO मुख्यालय से अमेरिकी झंडा भी हटा दिया गया है।
अमेरिकी सरकार का आरोप है कि WHO ने कोविड-19 महामारी से निपटने में गंभीर चूक की और जरूरी सुधार करने में नाकाम रहा। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि संगठन कुछ देशों के राजनीतिक दबाव में काम करता रहा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका भविष्य में WHO में दोबारा शामिल नहीं होगा और केवल औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए सीमित संपर्क बनाए रखेगा।
78 साल तक WHO का सबसे बड़ा सहयोगी रहा अमेरिका
अमेरिका WHO का संस्थापक सदस्य था और 1948 से लगातार 78 वर्षों तक संगठन से जुड़ा रहा। यह WHO का सबसे बड़ा फंडिंग देश भी था।
अमेरिका हर साल औसतन 111 मिलियन डॉलर सदस्य शुल्क और 570 मिलियन डॉलर से अधिक स्वैच्छिक योगदान देता था। अमेरिका के बाहर होने से WHO को बड़ा वित्तीय झटका लगा है।
WHO के मुताबिक अमेरिका पर 130 मिलियन से 278 मिलियन डॉलर तक का बकाया है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में यह राशि करीब 260 मिलियन डॉलर बताई गई है। अमेरिका ने यह बकाया चुकाने से इनकार कर दिया है।
वैश्विक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर
WHO दुनिया भर में एमपॉक्स, इबोला, पोलियो जैसी संक्रामक बीमारियों से निपटने में अहम भूमिका निभाता है। यह गरीब देशों को तकनीकी सहायता, वैक्सीन और दवाओं की सप्लाई करता है और सैकड़ों बीमारियों के लिए गाइडलाइंस जारी करता है। अमेरिका के अलग होने से वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नई महामारियों से लड़ने की वैश्विक क्षमता कमजोर हो सकती है। अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों को भी अंतरराष्ट्रीय हेल्थ डेटा तक पहुंच में दिक्कत आ सकती है, जो महामारी की शुरुआती चेतावनी के लिए अहम होता है। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ लॉरेंस गोस्टिन ने इस फैसले को “अपने जीवन का सबसे विनाशकारी राष्ट्रपति फैसला” बताया है।
एक साल में 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग हुआ अमेरिका
WHO से अलग होना ट्रंप प्रशासन की व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही अमेरिका करीब 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से बाहर निकल चुका है। इनमें संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी 31 संस्थाएं शामिल हैं, जैसे UN वुमेन, UNFCCC, UN पॉपुलेशन फंड, UN वॉटर, UN यूनिवर्सिटी और विभिन्न क्षेत्रीय आर्थिक आयोग।
इसके अलावा अमेरिका 35 गैर-यूएन संगठनों और पेरिस जलवायु समझौते से भी अलग हो चुका है। इनमें IPCC, इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी, इंटरनेशनल सोलर अलायंस और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर जैसी संस्थाएं शामिल हैं। ट्रंप सरकार का कहना है कि ये संगठन “वोक एजेंडा” को बढ़ावा देते हैं, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ है।
हालांकि, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और UNHCR में बना रहेगा, क्योंकि इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय सहायता के लिहाज से जरूरी माना गया है।
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