ईरान की ‘मोज्तबा ब्रिगेड’ ने फंसाया ट्रंप प्रशासन? जानें क्यों इस्लामाबाद वार्ता के बाद बैकफुट पर है अमेरिका

इस्लामाबाद/वाशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की मैराथन बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। सतह पर यह ईरान की विफलता लग सकती है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे तेहरान की एक ‘सोची-समझी जीत’ के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान ने अपनी ‘मोज्तबा ब्रिगेड’ की रणनीति के तहत अमेरिका की उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जहाँ सुपरपावर सबसे ज्यादा कमजोर महसूस कर रही है— आर्थिक स्थिरता।
रणनीतिक चाल: जिद नहीं, गहरी कूटनीतिईरान की रणनीति अब केवल सैन्य प्रतिरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ‘मोलभाव’ (Bargaining) की स्थिति में आ गया है। तेहरान अच्छी तरह जानता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की आर्थिक नब्ज है। वहां मामूली हलचल भी वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा सकती है।
ईरान का मानना है कि उसके पास खोने के लिए अब कुछ खास नहीं बचा है, लेकिन पाने के लिए पूरा वैश्विक बाजार और कूटनीतिक बढ़त है।
क्यों मजबूर हैं डोनाल्ड ट्रंप?
ये 4 बड़े कारण:विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन इस वक्त कई मोर्चों पर घिरा हुआ है, जिसके कारण वह ईरान के खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई से बच रहा है
घरेलू महंगाई: अमेरिका में तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई जनता के बीच असंतोष पैदा कर रही हैं।
मिड-टर्म इलेक्शन: अमेरिका में चुनाव नजदीक हैं, और कोई भी राष्ट्रपति युद्ध की लंबी तपिश के साथ वोट मांगने नहीं जाना चाहता।
महत्वपूर्ण दौरे: मई में राष्ट्रपति ट्रंप का प्रस्तावित चीन दौरा और किंग चार्ल्स की अमेरिका यात्रा कूटनीतिक प्राथमिकताओं में ऊपर हैं।
NATO का अभाव
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिना नाटो देशों के सक्रिय सहयोग के अमेरिका के लिए अकेले मोर्चा संभालना जोखिम भरा और खर्चीला सौदा है।
खाड़ी देशों और इजरायल की बेचैनी
दिलचस्प पहलू यह है कि इस वार्ता के बेनतीजा रहने से खाड़ी के अरब देशों और इजरायल ने राहत की सांस ली है।
इन देशों को डर था कि यदि कोई ‘डील’ होती है, तो क्षेत्र में ईरान का वर्चस्व (Hegemony) बढ़ जाएगा। पर्दे के पीछे से इन देशों के दबाव ने भी वार्ता को किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने से रोका है।
सैन्य मोर्चे पर ईरान की ‘आधी ताकत’ अब भी सुरक्षित
खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास उसकी मिसाइलों और घातक ड्रोनों का 50% से अधिक जखीरा अभी भी सुरक्षित है। ईरान का लक्ष्य अब सीधे युद्ध के बजाय अमेरिका को ‘थकाने’ (War of Attrition) की है। वह संघर्ष को जितना लंबा खींचेगा, अमेरिका पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव उतना ही बढ़ता जाएगा।
बाजी किसके हाथ में?
इस्लामाबाद वार्ता ने यह साफ कर दिया है कि ईरान अब झुकने के मूड में नहीं है। वह अपनी शर्तों पर डटा हुआ है क्योंकि उसे पता है कि युद्ध की हर बीतती लहर ट्रंप प्रशासन को घरेलू मोर्चे पर कमजोर कर रही है। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपनी साख बचाने के लिए केवल छिटपुट हमले जारी रखेगा या ईरान की शर्तों के आगे घुटने टेकेगा?



