अमेरिका-ईरान तनाव की आंच भारत की रसोई तक, LPG सप्लाई पर क्यों मंडरा रहा संकट?

जुबिली स्पेशल डेस्क
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का भारत से सीधा संबंध भले न हो, लेकिन इसका असर भारतीय घरों की रसोई तक पहुंचने लगा है। कई जगह गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं और छोटे होटल-रेस्तरां तक बंद होने लगे हैं। सवाल उठ रहा है कि जब यह जंग भारत की नहीं है, तो फिर गैस संकट की मार भारतीयों को क्यों झेलनी पड़ रही है।
दरअसल भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है और मौजूदा हालात में यही निर्भरता बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।
भारत में एलपीजी की खपत कितनी?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश है। देश में हर साल करीब 33-34 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है। तुलना करें तो चीन में यह खपत लगभग 100 मिलियन टन है।
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है, जबकि करीब 40 प्रतिशत गैस घरेलू रिफाइनरियों में तैयार होती है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2026 में भारत ने 1.158 मिलियन टन एलपीजी का उत्पादन किया, जबकि उसी महीने 2.192 मिलियन टन एलपीजी आयात की गई।
किन देशों से गैस खरीदता है भारत?
भारत के एलपीजी आयात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इनमें सबसे अहम भूमिका कतर और यूएई की है।
- कतर से लगभग 34 प्रतिशत एलपीजी आयात
- यूएई से करीब 26 प्रतिशत
- इसके अलावा सऊदी अरब और कुवैत भी भारत को गैस सप्लाई करते हैं।
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा जोखिम
खाड़ी देशों से आने वाले अधिकांश एलपीजी जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरते हैं। फिलहाल ईरान के साथ तनाव के कारण यह समुद्री मार्ग बेहद संवेदनशील हो गया है।
हमलों के खतरे की वजह से कई बीमा कंपनियों ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों का बीमा करने से इनकार कर दिया है। जो कंपनियां तैयार हैं, उन्होंने वॉर-रिस्क इंश्योरेंस का प्रीमियम 1000 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। इसके कारण शिपिंग कंपनियां इस रूट को बेहद जोखिम भरा मान रही हैं और सप्लाई चेन लगभग ठप जैसी स्थिति में पहुंच गई है।
अमेरिका से भी फिलहाल राहत नहीं
भारत और अमेरिका के बीच समझौते के तहत अमेरिका को भारत को करीब 2.2 मिलियन टन एलपीजी सप्लाई करनी थी, जो कुल आयात का लगभग 10 प्रतिशत होता।
लेकिन ईरान के साथ युद्ध जैसी स्थिति और अमेरिका में पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों के कारण फिलहाल वहां से भी सप्लाई बाधित है।
भारत अब अल्जीरिया, नाइजीरिया, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और कनाडा जैसे देशों से गैस आयात की संभावनाएं तलाश रहा है, लेकिन अभी तक कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है।
भारत कितना गैस स्टोर कर सकता है?
भारत आमतौर पर 25 से 30 दिनों का एलपीजी बफर स्टॉक बनाए रखता है। हालांकि इसमें कई तरह के स्टोरेज शामिल होते हैं।
विशाखापत्तनम और मंगलुरु में जमीन के नीचे बनी खास गुफाओं में एलपीजी स्टोर की जाती है, जिन्हें रॉक कैवर्न कहा जाता है।
- मंगलुरु कैवर्न क्षमता: करीब 80,000 टन
- विशाखापत्तनम कैवर्न क्षमता: करीब 60,000 टन
यानी कुल मिलाकर लगभग 1.4 लाख टन गैस ही इन गुफाओं में स्टोर हो सकती है, जो देश की खपत के हिसाब से सिर्फ दो दिन का बैकअप है।
बाकी गैस कहां स्टोर होती है?
भारत में गैस का बफर स्टॉक कई जगहों पर बंटा होता है
- एलपीजी बॉटलिंग प्लांट्स – देशभर में 200 से ज्यादा प्लांट्स में बड़े स्टोरेज टैंक (बुलेट्स)
- रिफाइनरी स्टोरेज – 23 रिफाइनरियों में गैस के बड़े टैंक
- ट्रांजिट स्टॉक – रिफाइनरी से प्लांट और प्लांट से डिस्ट्रीब्यूशन के बीच की गैस
- पाइपलाइन स्टॉक
S&P ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल एलपीजी भंडारण क्षमता करीब 1.9 मिलियन टन है, जिससे लगभग 22 दिनों तक गैस की आपूर्ति संभव है।
एलपीजी स्टोर करना इतना मुश्किल क्यों?
कच्चे तेल को स्टोर करना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन एलपीजी को प्रेशर के जरिए लिक्विड फॉर्म में रखना पड़ता है। इसके लिए विशेष टैंक, प्रेशराइज्ड सिलेंडर, स्टोरेज बुलेट्स और अंडरग्राउंड कैवर्न जैसी महंगी संरचनाएं बनानी पड़ती हैं।
इसी वजह से देश में एलपीजी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर सीमित है। सरकार अब गुजरात और ओडिशा के तटों पर नई कैवर्न बनाने की योजना पर काम कर रही है।
सरकार क्या कह रही है?
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार देश में एलपीजी उत्पादन में करीब 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
जनवरी 2026 में घरेलू उत्पादन 1.158 मिलियन टन था, जो बढ़कर करीब 1.5 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
हालांकि भारत में रोजाना एलपीजी की खपत करीब 90,000 टन है, इसलिए सिर्फ घरेलू उत्पादन से लंबे समय तक जरूरत पूरी करना संभव नहीं है।
गैस बचाने की सलाह
- इंडियन ऑयल ने उपभोक्ताओं को सलाह दी है कि
- खाना बनाते समय प्रेशर कुकर का इस्तेमाल करें
- उबाल आने के बाद आंच धीमी कर दें
- इससे करीब 25 प्रतिशत तक गैस की बचत हो सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल भारत के पास दो महीने का कच्चे तेल का स्टॉक मौजूद है और तेल की सप्लाई कई देशों से आती है। लेकिन अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है और रिफाइनरियों पर हमले बढ़ते हैं, तो इसका असर तेल सप्लाई पर भी पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में संकट सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की पूरी ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल खड़े हो सकते हैं।


