महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब

जुबिली न्यूज डेस्क

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने की मांग पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

याचिका में कहा गया है कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि नीति-निर्माण और शासन में उनकी भागीदारी बढ़े।

संसद में पहले ही पास हो चुका है 106वां संविधान संशोधन

इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने साल 2023 में 106वां संविधान संशोधन अधिनियम (Women’s Reservation Act) पारित किया था।इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था।

हालांकि, इस कानून को लागू करने की शर्त यह रखी गई थी कि इसे नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के पूरा होने के बाद ही लागू किया जाएगा।इसी शर्त को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है।

महिला सशक्तिकरण पर सरकार का पक्ष

इस साल जुलाई में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कहा था कि सरकार “संपूर्ण सरकार, संपूर्ण समाज” (Whole of Government, Whole of Society) दृष्टिकोण के तहत महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रही है।
मंत्रालय ने यह भी बताया था कि राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

  • 1957 में आम चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की संख्या कुल उम्मीदवारों का सिर्फ 3% थी।

  • 2024 तक यह बढ़कर 10% हो गई है।

  • पहली लोकसभा (1952) में केवल 22 महिलाएं चुनी गई थीं।

  • 17वीं लोकसभा में यह संख्या 78 और 18वीं लोकसभा में 75 रही, जो कुल सदस्यों का लगभग 14% है।

  • राज्यसभा में 1952 में 15 महिला सदस्य थीं, जो अब बढ़कर 42 हो गई हैं — यानी करीब 17%

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अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट अब इस बात पर विचार करेगा कि क्या सरकार द्वारा तय की गई “जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने की शर्त” उचित है या यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों में देरी करने का तरीका है।

कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से कहा है कि वे महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया, समयसीमा और अब तक की प्रगति पर विस्तृत जवाब दाखिल करें।

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