सिंगापुर : कोरोना की लड़ाई में कहां हुई चूक

  • कोरोना वायरस की लड़ाई में पिछड़ गया सिंगाुपर
  • तीन लाख से ज्यादा विदेशी कामगारों का कोविड-19 टेस्ट कराएगा सिंगापुर
  • कोरोना संक्रमितों की संख्या में हो रहा है तेजी से इजाफा

प्रियंका परमार

एक वक्त था जब कोरोना संक्रमण के मामलों पर काबू पाने के लिए दुनिया भर में सिंगापुर मॉडल की तारीफ हो रही थी। दुनिया के ज्यादातर देशों की निगाहें  सिंगापुर की ओर थी कि आखिर यह कैसे कोरोना वायरस को मात दे रहा है। दो माह तक सबकुछ ठीक रहा लेकिन अचानक से ही तस्वीर बदल गई। दस-बीस कोरोना संक्रमण के आने वाले मामले, सैकड़ों में आने लगे। फिर क्या, सवाल उठने लगा कि आखिर चूक कहां हुई।

कोविड-19 चीन की सीमा पार कर सबसे पहले सिंगापुर में ही पहुंचा था। इस महामारी को लेकर सिंगापुर सतर्क था तभी जब 23 जनवरी को यहां पहला मामला सामने आया तो युद्ध स्तर काम होने लगा। देश में संक्रमित मरीजों की पड़ताल शुरु होने के साथ-साथ बाहर से आने वाले लोगों पर भी निगरानी बढ़ा दी गई। संक्रमण को रोकने में काफी हद तक सरकार सफल भी होती दिख रही थी। बिना लॉकडाउन के यह सब सरकार ने किया, पर एक छोटी सी चूक ने सिंगापुर की परेशानी बढ़ा दी।

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कहते हैं न हर इंसान पहले अपने परिवार की जरूरते पूरी करता है उसके बाद ही वह किसी और की ओर देखता है। सिंगापुर सरकार ने भी ऐसा ही किया। उसने अपने देश के लोगों के स्वास्थ्य पर तो ध्यान दिया लेकिन दूसरे देशों से आए रह रहे लोगों को नजरअंदाज कर दिया।

सिंगापुर सरकार को वहां की बड़ी-बड़ी कंस्ट्रक्शन साइटों पर काम करते मजदूर, बड़े-बड़े जहाजों से सामान उतारते मजदूर, रिहाइशी इलाकों में सफाई करते लोग और एयरपोर्ट को चमकाने में लग सैकड़ों लोग दिखाई नहीं दिए। सरकार को ये एहसास ही नहीं हुआ कि ये लोग भी संक्रमित हो सकते हैं।

सिंगापुर में तीन लाख से अधिक श्रमिक, दक्षिण एशिया के देशों के है। ये वहीं श्रमिक है जिनकी वजह से सिंगापुर का कोना-कोना चमचमाता है। बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारते बनती हैं। इन्हीं की बदौलत सिंगापुर में साफ-सफाई से लेकर छोटे-छोटे काम होते हैं।

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कई बार किताबों में पढ़ा है कि सरकारों को गरीब नहीं दिखाई देते। उन्हें सिर्फ टैक्स पेयी और उद्योगपति ही दिखाई देते हैं। गरीब पर सरकारों को इस कदर भरोसा होता है कि वह उनके बीमार होने की कल्पना भी नहीं कर पाते। वह सोचते हैं कि वह इतने फौलादी होते हैं कि उन्हें न तो उन्हें कोई संक्रमण हो सकता है और न ही वह बीमार हो सकते हैं। दरअसल गरीबों को लेकर यह धारणा अधिकांश लोगों में होती है।

सिंगापुर में भी यहीं हुआ। सरकार ने सोचा ही नहीं कि ये श्रमिक भी कोरोना के चपेट में आ सकते हैं। और जब तक सरकार सचेत हुई बहुत देर हो चुकी थी। यहां के बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर कोविड 19 की चपेट में आ चुके थे।

ये श्रमिक घनी आबादी वाली डॉरमेटरी (रूम शेयरिंग) में रहते हैं। कई बार तो एक कमरे में 16-16 श्रमिक भी रहते हैं। अब ऐसे हजारों मजदूरों को क्वारंटीन में रखा गया है लेकिन अभी भी रोज सैकड़ों मजदूर पॉजिटिव पाए जा रहे हैं।

अब तक यहां डॉरमेटरी में रहने वाले 32 हजार से ज्यादा मजदूर कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, जो सिंगापुर की कुल पॉजिटिव आबादी का 10 फीसदी है।

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फिलहाल सिंगापुर प्रशासन ने अपने यहां रहने वाले 3 लाख 23 हजार विदेशी कामगारों का कोविड 19 टेस्ट कराने की योजना बना ली है। इन सब लोगों का टेस्ट होगा। अभी यहां हर रोज 3,000 के लगभग टेस्ट किए जा रहे हैं।

सिंगापुर में अब तक 24,671 कोरोना मामलों की पुष्टि हो चुकी है और संक्रमण की चपेट में आकर 21 लोगों की मौत हो गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि मरने वालों में ज्यादातर मजदूर हैं।

(प्रियंका सिंगापुर में रहती हैं। वह आईटी कंपनी में कार्यरत हैं। )

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