सांप्रदायिकता के दौर में महावीर स्वामी


स्मिता जैन “रेवा”
“जियो और जीने दो “की विराटता का सिद्धांत संपूर्ण ब्रह्मांड को 2552 वर्ष पूर्व हम सभी को देने वाले तीर्थंकर श्री १००८ महावीर स्वामी जी का आज संपूर्ण विश्व जन्म कल्याणक दिवस बड़े ही धूमधाम से सौहार्द्रता पूर्ण भावना से मना कर “अहिंसा परमो धर्म “की उद्धोषणा को अपने जीवन में पुनः स्वीकार कर विश्व बंधुत्व को मजबूती प्रदान कर रहा है।
साथ ही इस पवित्र मार्च के महीने में हम सभी चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि कोई भी धर्म को मानने वाले हैं ।अपने अपने धर्म प्रवर्तक को या महापुरुषों का जन्मदिन आदिशक्ति के जन्म उत्सव (दुर्गा अष्टमी), होली,रामनवमी, महावीर जन्म कल्याणक, ईस्टर ,ईद ,हनुमान जयंती को बरसों से मनाते आ रहे हैं।
मानव समाज जो सभी धर्म,संप्रदाय, पंथों को समानता के साथ स्वीकार करते हुए अपने पीढ़ियों को शिष्टाचार से संस्कारित बनाता आ रहा है ।हम धर्म को कितना अधिक अपने जीवन में महत्व देते हैं कि युग बीत रहे हैं किंतु उनके प्रवर्तक को हम आज भी वास्तविक या काल्पनिक रूप से स्वीकार करते हुए परंपरागत तरीके से मनाते चले आ रहे हैं।
बार-बार इन चर्चाओं से मन में विचार आता है कि यह धर्म क्या है ? तो समाज और दुनिया के बहुत सारे लोग जब एक ही प्रकार के जीवन शैली को स्वीकार करते हुए अपना जीवन यापन करने लगते हैं जिसमें पूजा-पाठ, कर्मकांड आदि समान होता है।
अनंत युगों की मानव सभ्यता में अनंत धर्म ,पंथ, संप्रदाय ने जन्म लिया सुना है 84 लाख। सबके अपने अपने कर्मकांड है, तरीके हैं एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित जीवन शैली को जीने के जिसमें अनेकों युग प्रवर्तकों ने अपना योगदान दिया और प्राकृतिक विविधता के आधार पर अपने अपने मतानुसार उनको अनेको धर्मों का नाम दिया और कर्मकांड भी दिया।
इंसान की प्रवृत्ति होती है ना अपने अपने कर्मकांड को करते-करते वह उससे इतना अधिक प्यार करने लगता है कि वह अपने धर्म ,अपने कर्मकांड से दूसरों की तुलना करने लगता है श्रेष्ठता को साबित करने के लिए ।
बस यहीं से शुरू हो जाता है सांप्रदायिकता का खूनी खेल जिसे युगों से मानव समाज ढोता आ रहा है और अपनों अपनों को खून की नदी में ,लाशों के ढेर में दबाता जा रहा है ।
फिर यही सांप्रदायिकता वगैर राजनीतिक हस्तक्षेप के आगे नहीं बढ़ती है ।फलती फुलती नहीं है इसी के कारण मानव समाज का विकास आगे बढ़ते बढ़ते फिर उसी पाशविक युग में लौट जाता है।
युगो युगो से हम पत्थरों के मंदिर ,मस्जिदों , चर्चों आदि में विराजित पत्थरों को भगवान का रूप मानकर पूजते और लड़ते आ रहे हैं और अपने मानव समाज को खोते जा रहे हैं ।
आज संपूर्ण विश्व सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयतावाद, नस्लीयवाद,रंगभेद आदि पर लड़ रहा है और खतरनाक हथियारों की होड़ मची हुई है। इंसान ,इंसान के खून के प्यासे हो रहा है ।
इन सभी के पीछे देखे तो सत्ताधारीयों के द्वारा प्रायोजित उपनिवेशवाद ही होता है जिसमें चंद लोगों के अरमानों ,इच्छाओं की सत्ता पूर्ति हो जाती है और आम जनता निरीह पशु की भांति मारी काटी जाती है।
सभी सत्ताओं का पोषण पूंजीवाद से ही शुरू होता है और उपनिवेशवाद पर खत्म हो जाता है किंतु इसके लिए धर्मों का सहारा लिया जाता है समाज के लोगों को धर्म का डर दिखाकर ,पाप-पुण्य में भेद बताकर उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर कर दिया जाता है।
आजकल एक और दौर चल रहा है जहां जबरदस्ती लोगों को अपना धर्म छोड़ कर के किसी और का धर्म स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है ।कभी पैसे देकर, कभी सुविधाएं देकर ,कभी हथियारों के दम पर, तो कभी पारिवारिक दबाव बनाकर ।
हर कहीं ,हर कोई बस अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है ।इंसानियत की जैसे कोई बात ही नहीं करता। बस अब तो किसी भी तरह ,किसी भी व्यक्ति की सनक को पूरा करने का ,उसके जुनून को पूरा करने का और उनका साथ देने वाले लोगों को तैयार किया जा रहा है साम, दाम ,दंड, भेद ।
वर्तमान का यही चलन हो गया है ऐसी स्थिति में महावीर का सिद्धांत “जियो और जीने दो “बार-बार हमारे सामने खड़ा होकर हमें इंसान बनने के लिए प्रेरित कर रहा है ।
इस दौर में आज यह सब बहसीपन धर्म के नाम पर हो रहा है ।यूं लगता है कि शायद ही अब इस आंधी से कोई और धर्म बच पाएगा या फिर इस भारत भूमि पर सिर्फ एक ही धर्म रह जाएगा जोकि अनेक धर्मों, सभ्यताओं, संस्कृतियों की जननी है ।इस भरत क्षेत्र को रक्तरंजित किया जा रहा है सिर्फ और सिर्फ धर्म के नाम पर ।
ऐसे में महावीर का “अहिंसा परमो धर्म” और “जियो और जीने दो” दोनों ही कितने अधिक प्रभावी हैं, शाश्वत है लेकिन यह प्रभाव इंसानों पर ही होता है उन लोगों तक होता है जिनके अंदर इंसानियत है ,मानवता है ।
जो बहशी बन गए हैं उनके अंदर अब कोई भावना नहीं ।वह तो बस दिए गए आर्डर पर चलने वाले लोग बन गए हैं। उनको कुछ भी महसूस नहीं होता ,एहसास नहीं होता, किसी के दुख दर्द परेशानियां, अब कोई मायने नहीं रखती हैं।
लगता है धर्म एक जबरजस्ती बनवाई जाने वाली वस्तु बन गई है। उसमें अब कोई आस्था नहीं रह गई बस वह एक व्यापार बन गई है और संगठित लूट का माध्यम बन गई है
इस खौफनाक परिवेश में भगवान महावीर के द्वारा बताया गया सिद्धांत ‘जियो और जीने दो “ही शाश्वत और श्रेष्ठ नजर आता है जिसमें अपने साथ-साथ विश्व के कल्याण की पवित्र भावना समाहित होती है जो हर युग में हमें मानव बढ़ने की प्रेरणा देती है और मानवता से प्यार करने को मजबूर करती है ।
मनुष्य के साथ-साथ ,जीव जंतुओं, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के साथ भी सांमजस्य की भावनाओं को मजबूती प्रदान करती है क्योंकि महावीर स्वामी जी किसी धर्म विशेष के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के पथ प्रदर्शक हैं ।
अब यह 21वीं सदी के महामानव को सुनिश्चित करना है कि सांप्रदायिक कट्टरता के चयन से समाज का विनाश या मानवता रूपी विश्व धर्म से जीवन का विकास एवं नया सृजन होगा।



