दिग्गजों का कद और सियासत की नई दिशा तय करेगा उपचुनाव

रूबी सरकार

मध्यप्रदेश के जिन 28 सीटों में उपचुनाव होने जा रहा है। उनमें एक सीट पोहरी विधानसभा का है। यहां बहुजन समाज पार्टी अपना जनाधार वापस पाने की तैयारी में है। बसपा इस बार उपचुनाव से दूरी रखने की अपनी परंपरा को तोड़ने जा रही है। उसे उम्मीद है कि वर्ष 2018 में लगे झटके से उबरकर वह वर्ष 2008 की स्थिति में आ सकती है।

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बसपा ने एक बार फिर 2018 के चुनाव के अपने उम्मीदवार कैलाश कुशवाह को यहां से अपना प्रत्याशी बनाया है। पोहरी विधानसभा सीट तबके कांग्रेसी विधायक सुरेश धाकड़ के ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में चले जाने से खाली हुआ है। वर्ष 2018 में पोहरी सीट के साथ-साथ करैरा और जौरा में भी बसपा का मत प्रतिशत 23 से 32 फीसदी तक पहुंच गया था।

2018 के चुनाव में कांग्रेस के सुरेश धाकड़ ने कैलाश कुशवाहा को 7 हजार, 918  मतों से पराजित किया था। दरअसल ग्वालियर के आस -पास होने वाले 16 सीटों में कभी बसपा का जबरदस्त दबदबा था। कांग्रेस ने 2018 में मतदाताओं को भरोसा दिया था कि सरकार बनने पर वह एट्रोसिटी एक्ट के भारत बंद के दौरान उन पर दर्ज मुकदमें वापस लेगी, लेकिन कमलनाथ सरकार ने इस वादे को नहीं निभाया ।

यह उपचुनाव उम्मीदवारों के चाल चलन उनके व्यवहार  विश्वसनीयता और कामों पर होना तय है। मतदाता उनके  कामकाज के रिपोर्ट कार्ड पर ज्यादा ध्यान देते दिख रहे हैं।उम्मीदवारों  के 15 महीने की कमलनाथ सरकार में कार्यकर्ता और वोटर के प्रति  जो व्यवहार था, उस  रिपोर्ट कार्ड का भुगतान उम्मीदवार के साथ पार्टी को भी करना  पड़ेगा।

MP By-election : उपचुनाव तय करेंगे दिग्गजों का सियासी भविष्य , नहीं है राह आसान

वोटर और कार्यकर्ताओं के इस रूप से प्रत्याशी और पार्टी दोनों ही हैरान है। भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जननायक वाली छबि और भाजपा के स्टार लीडर बने ज्योतिरादित्य सिंधिंया के  मैजिक पर सबकी निगाहें रहेगी। इन दोनों नेताओं को संगठन व संघ परविार मैदानी मदद कर रहा है।

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यह त्रिकोणीय मुकाबला कांग्रेस पार्टी के अनुभवी 80 के दषक में विधायक रहे हरिवल्लभ शुक्ला, जबकि भाजपा से पूर्व विधायक सुरेश धाकड और बसपा प्रत्याषी कैलाश कुशवाहा के बीच होगा़। श्री शुक्ला पूर्व में यहां से कांग्रेस विधायक रह चुके हैं और वे कांग्रेस के अनुभवी नेता हैं।

इस उपचुनाव के बाद सरकार आने से  कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन भाजपा और खास  तौर से ज्योतिरादित्य सिंधिंया की प्रतिष्ठा जरूर दांव पर लगी है। पोहरी के पिछले 5 चुनाव का रिकॉर्ड देखा जाए तो  तीन चुनावों में भाजपा और एक- एक चुनाव में समानता दल तथा कांग्रेस ने जीत दर्ज की है।

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