जुबिली स्पेशल डेस्क
संसद की स्थायी समितियों के कार्यकाल को बढ़ाने की दिशा में तैयारी तेज हो गई है। वर्तमान में ये समितियां हर साल पुनर्गठित होती हैं, लेकिन अब इस अवधि को एक साल से बढ़ाकर दो साल करने पर विचार चल रहा है। इसका उद्देश्य समितियों को विधेयकों, रिपोर्टों और नीतिगत विषयों की गहराई से समीक्षा करने का पर्याप्त समय प्रदान करना है। फिलहाल मौजूदा समितियों का कार्यकाल 26 सितंबर को समाप्त हो चुका है।
इस प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व भी खास है। कांग्रेस के सांसद शशि थरूर, जो वर्तमान में विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं, यदि कार्यकाल दो साल कर दिया जाता है तो वे पार्टी के मतभेदों के बावजूद इस पद पर दो साल और बने रह सकते हैं।

संसदीय स्थायी समितियां लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों से मिलकर बनती हैं और ये विधायी जांच, सरकारी नीतियों की समीक्षा, बजट आवंटन की निगरानी के साथ-साथ मंत्रालयों को जवाबदेह भी ठहराती हैं। संसद के सत्र न होने पर ये समितियां ‘मिनी संसद’ की भूमिका निभाती हैं और सांसदों को विस्तार से नीतिगत और विधायी मामलों की जांच करने का अवसर देती हैं।
अभी तक अध्यक्षों में बड़े बदलाव की संभावना कम है, लेकिन नए सदस्यों का कार्यकाल एक साल से बढ़ाकर दो साल करने पर विचार हो रहा है, जिससे समितियों को निरंतरता और बेहतर फोकस के साथ काम करने में मदद मिलेगी। विपक्ष समेत कई सांसद भी इस कदम का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि एक साल का कार्यकाल पर्याप्त नहीं होता।
बता दें कि कांग्रेस और शशि थरूर के बीच रिश्ते अक्सर उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। कई मौकों पर थरूर को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की आलोचना का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा, थरूर अक्सर कांग्रेस से अलग सरकारों की तारीफ भी करते रहे हैं।”
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