‘खाली कागजों पर साइन कराए गए, उससे साफ था कि हमें बलि का बकरा बनाया जा रहा था’

न्यूज डेस्क

23 साल बहुत होते हैं। 23 साल मतलब 8,395 दिन। जेल के सलाखों के पीछे इतना लंबा वक्त गुजारना आसान नहीं होता, वह भी तब जब आपको पता हो कि आप बेगुनाह हैं। तकलीफ में तो एक पल काटना मुश्किल होता है, फिर इतना लंबा वक्त मोहम्मद अली, लतीफ अहमद वाजा और मिर्जा निसार हुसैन ने कैसे गुजारा होगा, सोच कर सिहरन होती है। इन तीनों ने आजादी की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। बिखर चुकी जिंदगी समेटना इनके लिए आसान नहीं है।

अली मोहम्मद भट्ट

23 साल बाद जेल से छूटे बेगुनाह अली मोहम्मद भट्ट  43 साल के हो चुके हैं। जब अपने घर कश्मीर पहुंचे तो वहां उनका स्वागत करने के लिए कोई अपना नहीं था।

रिश्तेदार, पड़ोसी उन्हें देखकर भावुक हो गए। गले मिलते ही आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पूरे माहौल में एक अजीब सी टीस थी। शायद 23 साल बर्बाद होने की टीस थी।

भट्ट के माता-पिता का देहांत उस समय हो गया था जब वह दिल्ली और राजस्थान की जेलों में बंद थे। भट्ट समेत तीन लोगों को 1996 में काठमांडू से गिरफ्तार किया गया था।

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लाजपत नगर बम विस्फोट मामले में हुई थी गिरफ्तारी

मोहम्मद अली भट्ट, लतीफ अहमद वाजा और मिर्जा निसार हुसैन को 1996 में लाजपत नगर बम विस्फोट मामले में काठमांडू से अरेस्ट किया गया था। उस समय इन तीनों की उम्र लगभग 20 साल थी।

इन तीनों पर बाद में राजस्थान पुलिस ने दौसा में एक बस में हुए ब्लास्ट के आरोप लगाए थे। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने नवंबर 2012 में लाजपत नगर केस से बरी कर दिया था लेकिन तीनों को राजस्थान हाईकोर्ट में उनकी अपील की सुनवाई के लिए जेल में रहना पड़ा। इसी सप्ताह राजस्थान हाईकोर्ट ने भी तीनों को दोषमुक्त करार दिया।

लतीफ अहमद वाजा

हम सभी बेगुनाह थे…

इन तीनों का कहना है कि इन लोगों से पुलिस से कोरे कागज पर साइन कराया था। कोरे कागज पर साइन कराने पर  श्रीनगर के खानकाह इलाके के निवासी लतीफ अहमद वाजा कहते हैं, ‘हमें जिस समय काठमांडू से अरेस्ट किया गया था उस समय हम कश्मीरी हस्तकला की चीजें बेच रहे थे। हम सभी बेगुनाह थे… नेपाल में रहते हुए कोई कैसे दिल्ली या राजस्थान में बम विस्फोट कर सकता है? लेकिन हमें जिस तरह टॉर्चर किया गया… खाली कागजों पर साइन कराए गए, उससे साफ था कि हमें बलि का बकरा बनाया जा रहा था।’

कब्रों से लिपटकर बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रोए भट्ट 

मोहम्मद अली भट्ट की मां का देहांत 2002 में हो गया था, जबकि उनके पिता की मृत्यु 2015 में हुई। जब भट्ट अपने घर पहुंच तो वह सीधे कब्रिस्तान गए। वहां पहुंच कर वह अपने माता-पिता की कब्रों से लिपटकर बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रोए।

वह कहते हैं, ‘मेरे साथ हुए अन्याय में मेरी आधी जिंदगी जाया हो गई। मैं पूरी तरह से टूट गया हूं। मेरे माता-पिता मेरी दुनिया थे… लेकिन अब वे नहीं रहे। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

मिर्जा निसार हुसैन

आजादी की बहुत बड़ी कीमत चुकाई

कदल के रहने वाले मिर्जा निसार हुसैन का कहना है, ‘जब हम जेल में थे तो लगा समय हमारे लिए रुक गया है, लेकिन बाहर दुनिया तो अपनी गति से चल रही थी। अब इस नई जिंदगी के साथ चलने में हमें काफी लंबा समय लगेगा। इस आजादी की हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है।’

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