आधुनिक नारी…….एक सजावटी गुड़िया

स्मिता जैन रेवा

आधुनिक नारी एक सजावटी गुड़िया बनकर रह गई है जो रील में तो बड़ी खूबसूरत और बोल्ड नजर आती है लेकिन रियल में वही..👎 चंद अपवादों को छोड़कर।

महिलाओं का चुप होना नहीं होता बल्कि आधी आबादी का चुप हो जाना होता है और आधी आबादी का चुप होना मतलब देश के तीन चौथाई जनसंख्या का चुप हो जाना जिसे किसी बात से कोई परेशानी नहीं ।जो हो रहा है बस अच्छा हो रहा है और आंख बंद करके अपनी कमजोरी को छिपा लेती है उनके साथ उनका पुरुष समाज भी उनकी साड़ी के घूंघट में छिप जाता है।

किटी पार्टी या और अन्य पार्टी में देखें तो फिल्मी हीरोइन सी नजर आती हैं। धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़ चढकर हिस्सा लेती हैं। शादी समारोह में तो कहना ही क्या।

लाडली बहन या अन्य मुक्त की योजनाओं के रुपए लेने में तो बहुत ही आगे होती हैं लेकिन वह यह नहीं सोचती कि हम जो रुपए ले रही हैं ।वह हमारे आने वाली पीढियां को और वर्तमान को ही तो चुकाना है ।इसका विरोध नहीं कर सकती बल्कि खुश होकर अपने देश के ऊपर कर्ज बढ़ाती जा रही है।

क्या आधुनिक नारी इतनी कमजोर है कि अपने और अपने परिवार के साथ, अपने समाज और देश के साथ हो रहे गलत कामों का विरोध नहीं कर सकती। क्या उससे उसके परिवार पर विपरीत प्रभाव नहीं पड रहा है ।चाहे वह बेरोजगारी हो, महंगाई हो, व्यापार का चौपट होना हो ,उसकी आन लाइन शापिंग से, खराब स्वास्थ्य व्यवस्था आदि आदि।वह अपनी बोल्डनेस को मुखर होकर समाज के सामने क्यों नहीं रख रही है क्योंकि उसे लगता है वह संगठित नहीं है। जब अन्य कमों में एक गुड़िया बनकर वह संगठित है तो एक वास्तविक नारी बनकर क्यों संगठित नहीं है ?

क्या मतलब उन रीलबाज औरतों का जो किसी महिला और बच्ची का बलात्कार होने के बाद एक शब्द भी नहीं बोलती और एक पोस्ट भी नहीं कर सकती हैं?

क्या उन महिलाओं ने सोच लिया है कि हम एक गुड़िया है, मनोरंजन की जिसे सिर्फ शारीरिक रूप से सुंदर नजर आना जरूरी है। पुरुषों के मनोरंजन के लिए वह एक माध्यम बनती जा रही है और अपनी पहचान, अपना शौर्य खोती जा रही है।

वह यह भूल जाती है कि इस धरती पर इसी भारत भूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ,रानी दुर्गावती, जैसी महान वीरांगनाओं ने जन्म लिया और बढ़ चढ़कर अपने समाज और देश का नेतृत्व किया।

खुद को इतना कमजोर क्यों समझ लिया है हमारी मातृशक्ति ने यह सोच से परे होता जा रहा है इतनी खामोशी, इतनी खामोशी के जैसे मुर्दा समाज हो और वह जिंदा ही ना हो।

आज आधुनिक जीवन शैली में घरेलू कामों में इतना समय नहीं लगता कि वह अपने प्रतिभा को प्रदर्शित न कर सके और उसका उपयोग भी ना कर सके। वह सब कर सकती है लेकिन उसने तो अपने ऊपर कायर और डरपोक होने का लेवल लगा लिया है। वह अन्य कामों में तो संगठित होकर काम करती हैं लेकिन अपने ही अस्तित्व को बचाने के लिए कभी भी संगठित नहीं होती चाहे वह घरेलू महिला हो या किसी भी कार्य क्षेत्र में काम करने वाली महिला।

अपने शोषण के प्रति कुछ भी नहीं बोलती बल्कि अपनी नियति मानकर चुप हो जाती है इसी का परिणाम है कि आज महिलाओं के साथ बेहद क्रूरता पूर्वक अपराध किया जा रहे हैं और उन पर ना तो सरकार कोई कठोर कानून बनाती है, ना किसी को कठोर सजा होती है क्योंकि पुरुष समाज समझता है की औरतों में अपने हक के लिए लड़ने के लिए संगठित होने के लिए क्षमता नहीं है क्योंकि वह एक मोम की गुड़िया है।

क्या एक कमजोर मां से कमजोर बच्चे और कमजोर परिवार विकसित नहीं होगा? और एक कमजोर राष्ट्र की बुनियाद भी वही मातृशक्ति के नाम लिखी जायेगी।

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