# बिना_पते_की_चिट्ठियां

 

वत्सला पाण्डेय

मन के धूल भरे गलियारे में 
फड़फड़ाती है अनगिनत चिट्ठियां

वो चिट्ठियां जिन्हें नहीं मालूम होता अपना नसीब
वो नहीं जानती कि लिखने के बाद उनका क्या होगा
वो बस लिखी जाती है, उम्मीदों की स्याही से….

उन्हें चाह होती है कि उन्हें भरपूर मन से पढ़ा जाय
उन्हें ये भी चाह होती है कि पढ़ने से पहले उन पर अंकित किये जाय, दो शहदीले होंठो के रसीले चुम्बन…

उन चिट्ठियों की चाहतें अधूरी रह जाती हैं
उन अधूरी चाहतों और उम्मीदों की स्याही में लपेट कर
वो खोलती हैं अनगिनत मन के अनगिनत कच्चे चिट्ठे….

चिट्ठियां अक्षरो में घोल लेती है आंसुओ का खारापन
वो आंसू जो तन्हाइयों में चांद को निहारते समय बरसते हैं
वो आंसू जो सिन्दूरी शाम में इंतज़ार की चौखट बन बैठते हैं…

चिट्ठियां याद दिलाना चाहती हैं भूली बिसरी मोहब्बत 
वो याद दिलाना चाहती हैं समर्पण और विश्वास की 
चाशनी में पगे, प्रेम -व्यंजनों के स्वाद को…

चिट्ठियां सब कुछ लिखती हैं,
वो दर्द लिखती हैं, तो ख़ुशी भी लिखती हैं
बस नहीं लिख पाती है तो अपना पता….

इसीलिए फड़फड़ाती रह जाती हैं
निगोड़ी औरतो के धूल धूसरित मन के गलियारे में….

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