तो क्या सरना को अलग धर्म घोषित करने की मांग ने बदला झारखंड का चुनावी गेम

न्‍यूज डेस्‍क

झारखंड विधानसभा की 81 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे आज आ रहे हैं। अब वोटों की गिनती शुरू हो चुकी है और बीजेपी और जेएमएम गठबंधन के बीच कड़ी टक्कर होती दिख रही है लेकिन किसी पार्टी को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। हालांकि कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन और बीजेपी के रूझानों में 10 सीटों का अंतर दिखाई रहा है, जो मिनट-टू-मिनट बदलता भी जा रहा है।

किसी को बहुमत न मिलने की स्थिति में आजसू-JVM जैसे छोटे दल किंगमेकर बन सकते हैं। बीजेपी जहां एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने की उम्मीद कर रही है तो वहीं कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन की नजर सत्ता पर दोबारा वापसी की है और रूझानों को देखें तो जेएमएम गठबंधन की वापसी तय मानी जा रही है।

यूं तो झारखंड गैर आदिवासी मुख्‍यमंत्री रघुवर दास से लेकर के भ्रष्‍टाचार तक कई मुद्दे चुनाव में हावी रहे। लेकिन झारखंड में चुनाव के दौरान जो एक खास मुद्दे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया वह था एक अलग धर्म की मांग। यह मांग आदिवासियों द्वारा की जा रही थी। यहां बात हो रही सरना धर्म की।

जानकारों की माने तो सारन हिन्दू धर्म से बहुत अलग है। बता दें कि इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने वादा किया है कि इन्हें अलग धर्म घोषित किया जाएगा। हालांकि धर्म से जुड़ा यह मुद्दा सरकार में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को लेकर अधिक है।  इनका तर्क है कि अकेले झारखंड में सरकारी आंकड़े के मुताबिक़ क़रीब 80 लाख आदिवासी हैं, जबकि हक़ीक़त में यह संख्या और ज़्यादा है।

झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में से 28 सीटें और 14 लोकसभा में चार सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं और आदिवासी इलाक़ों के लिए अलग से ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल भी है।

सरना धर्म मानने वालों का कहना है कि सूर्य हमारा पिता है और सरना हमारी माता। आदिवासी पर्यावरण की आराधना करते हैं। वे जंगल, जमीन और सूर्य की पूजा करते हैं। सरना आदिवासी समुदाय का कहना है कि वे हिंदू नहीं हैं। वे प्रकृति के पुजारी हैं। उनका अपना धर्म है ‘सरना’, जो हिंदू धर्म का हिस्सा या पंथ नहीं है। इसका हिंदू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। उनकी मुख्य मांग है कि उनकी गणना में उनके आगे हिंदू न लिखा जाय।

दिवासी सरना महासभा के संयोजक शिवा कच्छप कहते हैं, “धर्म आधारित जनगणना में जैनियों की संख्या 45 लाख और बौद्ध की जनसंख्या 84 लाख है। हमारी आबादी तो उनसे कई गुना ज़्यादा है। पूरे देश में आदिवासियों की आबादी 11 करोड़ से ज्यादा है। फिर क्यों न हमारी गिनती अलग से हो?”

देश भर में करीब 12 करोड़ की आबादी वाले इस समुदाय के लोगों ने मांग की है कि उन्‍हें अलग धर्म घोषित किया जाए। बड़े पैमाने पर आदिवासियों के मुद्दे पर लिखने वालीं वंदना टेटे कहती हैं कि मानों हमारी कोई पहचान ही नहीं है। एक शख्स जो ना तो क्रिश्चियन है, ना मुस्लिम, ना सिख और जिसे हिन्दू नहीं होना। एक ऐसा विचार है जिसमें कहा जाता है कि हिन्दू धर्म सबसे ऊपर है।‘

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