ईरान के ‘शांति प्रस्ताव’ की 3 बड़ी शर्तें: क्या मानेगा अमेरिका?

Iran-US Conflict Update: खाड़ी देशों में मंडराते युद्ध के बादलों के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी हमले के बढ़ते खतरे को देखते हुए ईरान ने कूटनीतिक रास्ता चुनते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक ‘नया शांति प्रस्ताव’ भेजा है।

दिलचस्प बात यह है कि इस हाई-प्रोफाइल समझौते के लिए ईरान ने पाकिस्तान को अपना मध्यस्थ (बिचौलिया) बनाया है। रूस और ओमान से लंबी चर्चा के बाद तैयार किए गए इस प्रस्ताव को ईरान का ‘आखिरी कार्ड’ माना जा रहा है।

ईरानी न्यूज एजेंसी के मुताबिक, विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की सलाह पर यह प्रस्ताव तैयार किया है। इसे सीधे पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया गया है। अब इस पर अंतिम फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेना है, जिन्होंने पहले ही ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ की नीति अपना रखी है।

ईरान ने इस प्रस्ताव में दुनिया की सबसे अहम जलसंधि ‘होर्मुज’ (Strait of Hormuz) और अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर बड़ा दांव खेला है:

  1. होर्मुज का टोल और नाकाबंदी: ईरान होर्मुज को अपनी शर्तों पर खोलने को तैयार है, लेकिन उसकी मांग है कि बाहर लगी अमेरिकी नाकाबंदी तुरंत खत्म हो। साथ ही, ईरान वहां से गुजरने वाले जहाजों से ‘टोल टैक्स’ वसूलने का अधिकार मांग रहा है।
  2. न्यूक्लियर डील पर ‘डेडलॉक’: परमाणु संवर्धन (Enrichment) को रोकने के लिए ईरान 10 साल की समय सीमा का सुझाव दे रहा है, जबकि अमेरिका इसे कम से कम 20 साल करना चाहता है। नए प्रस्ताव में ईरान ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है।
  3. 100 अरब डॉलर की मांग: ईरान ने साफ किया है कि बातचीत शुरू होने के पहले चरण में उसे पाबंदियों से राहत के तौर पर 100 अरब डॉलर की रकम दी जाए, ताकि वह अपनी डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभाल सके।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई खुद इस प्रस्ताव की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने होर्मुज के रणनीतिक महत्व से कोई समझौता न करने की बात दोहराई है। अमेरिका की ओर से इस पूरी बातचीत को लीड करने का जिम्मा उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को सौंपा जा सकता है, जबकि ईरान की तरफ से संसद के स्पीकर गालिबफ कमान संभाल रहे हैं।

दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है और पश्चिम एशिया में शांति का रास्ता साफ हो सकता है। लेकिन अगर यह वार्ता विफल रही, तो ईरान पर एक बड़े सैन्य हमले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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