Iran–Israel War News: क्या ईरान में ‘रिजीम चेंज’ का सपना अधूरा रह गया?

जुबिली स्पेशल डेस्क
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों ने मध्य-पूर्व को जंग के मुहाने पर ला खड़ा किया है। हमलों में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत शीर्ष नेतृत्व के मारे जाने की खबरों ने हालात और भड़का दिए। मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए ईरान के सैन्य व रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया।
हालांकि, इन हमलों के बावजूद अमेरिका का मकसद पूरी तरह हासिल होता नहीं दिख रहा।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अनुमान लगाया था कि कुछ ही दिनों में ईरान पर दबाव निर्णायक साबित होगा, लेकिन घटनाक्रम उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ा।
ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। हमलों में अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने और एयरबेस को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं। इससे संकेत मिलता है कि संघर्ष एकतरफा नहीं रहा।
क्या था असली मकसद?
विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे अभियान के पीछे अमेरिका की बड़ी रणनीति “रिजीम चेंज” यानी सत्ता परिवर्तन की रही। वॉशिंगटन लंबे समय से तेहरान में ऐसी सरकार चाहता था जो उसकी शर्तों के अनुरूप नीतियां अपनाए। खामेनेई के रहते यह संभव नहीं माना जा रहा था।
इसके साथ ही ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका चिंतित रहा है। भले ही तेहरान ने सार्वजनिक रूप से परमाणु हथियार विकसित करने की बात से इनकार किया हो, लेकिन वॉशिंगटन को संदेह था कि ईरान पर्दे के पीछे परमाणु क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
अधूरी क्यों रह गई हसरत?
खामेनेई की मौत के बाद भी ईरान की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव नजर नहीं आया। व्यापक स्तर पर सत्ता विरोधी प्रदर्शन सामने नहीं आए हैं। इसके उलट, कई जगहों पर अमेरिकी हमलों की निंदा होती दिखी।
यही वह बिंदु है जहां अमेरिका की रणनीति को झटका लगता दिख रहा है। यदि उद्देश्य सत्ता परिवर्तन था, तो वह अब तक साकार नहीं हो सका है। ईरान लगातार जवाबी हमले कर रहा है और अपनी स्थिति को मजबूत दिखाने की कोशिश में है।
ऐसे में सवाल बना हुआ है क्या यह जंग लंबी चलेगी? क्या अमेरिका अपनी रणनीति बदलेगा? फिलहाल मध्य-पूर्व में हालात बेहद संवेदनशील हैं और आगे की दिशा पूरी तरह अनिश्चित नजर आ रही है।
